माँ मातंगी देवी (मोढ़ेश्वरी माता) का विस्तृत इतिहास और पौराणिक महत्व
🔱 महाविद्या प्राकट्य एवं स्वरूप
भारत की दिव्य शक्ति त्रिकोण में — महाविद्या त्रिपुरा सुंदरी, मातंगी और कामला का विशेष स्थान है। इनमें माँ मातंगी देवी दस महाविद्याओं में से एक हैं। उन्हें तांत्रिक स्वरूप की सरस्वती भी कहा जाता है। माँ मातंगी ज्ञान, वाणी, संगीत, कला और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। श्री मातंगी देवी अर्थात राजमाता दस महाविद्याओ की एक देवी है। मोड़ ब्राह्मन की कुल देवी है । मोहकपुर की मुख्या अधिष्टाता है देवी मातंगी की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है।
जिस प्रकार त्रेता युग में सत्य मंदिर, द्वापर युग में वेद्भुवन, कलयुग में मोहेसपुर जग प्रसिद्ध ही उसी प्रकार मध्य कल में मोढेरा के रुप में मातंगी का यह स्थान जग प्रसिद्ध हुआ । श्री ब्रह्मा जी ने स्वयं के मुख से श्री माता को प्रकट किया है। मोहकपुर में बसे हुए ब्राह्मणों की रक्षा हेतु श्री माता की स्थापना की गयी। श्री माता के हाथो में पुस्तक, कमंडल होती है, वस्त्र श्वेत अर्थात सफ़ेद होते है ये महालक्ष्मी और रुद्राणी भी कहलाती है।
✨ मातंगी स्वरूप का तांत्रिक एवं तात्विक विवेचन
तंत्र शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी दस महाविद्याओं में नवम (9वीं) स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। इन्हें 'राज-मातंगी', 'मंत्रिणी देवी' और 'श्यामला देवी' के नाम से भी पुकारा जाता है। देवी का यह अलौकिक स्वरूप ब्रह्मांड की ६४ कलाओं (64 Arts) का स्वामी है। जहाँ माता सरस्वती केवल बाहरी ज्ञान और विद्या की देवी हैं, वहीं माँ मातंगी अंतर्मन की गहरी समझ, गुप्त शक्तियों, वाक्-सिद्धि (Vaksiddhi) और ब्रह्मांडीय नाद की अधिष्ठात्री हैं। बुद्ध ग्रह की अधिष्ठात्री होने के कारण वे तीक्ष्ण बुद्धि और आकर्षण शक्ति (Vashikaran Shakti) प्रदान करती हैं।
॥ महाकवि कालिदास कृत श्यामल दंडकम ध्यानम् ॥
माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलापाम् ।
मातङ्गतनूजां शशिशेखराधारां स्मरामि सर्वेश्वरवामभागम् ॥
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती ने एक बार चांडाल (उच्छिष्ट) रूप धारण कर परस्पर लीला की थी, तब देवी का यह स्वरूप प्रकट हुआ था। इसी कारण इन्हें 'उच्छिष्ट चंडालिनी' भी कहा जाता है। वे सामाजिक बंधनों से परे, वन और प्रकृति की अनंत ऊर्जा में वास करती हैं।
⚔️ कर्नाट राक्षस का आतंक और मोढ़ेश्वरी अवतार
श्री माता की रक्षा कवच में वास करते करते ब्राह्मणों को सेकड़ो वर्ष बीत गए। तभी वहा कर्नाट नाम का एक राक्षस हुआ। यह राक्षस ब्राह्मणों को खूब परेशान करता और यज्ञ , पूजा विधान आदि में भारी विघ्न उत्पन्न करने लगा थक हार के सभी ब्राह्मन इस पीड़ा से मुक्ति हेतु श्री माता के पास पहुचे श्री माता ने सभी ब्राह्मणों को आशीर्वाद प्रदान कर राक्षसों का नाश करने का वचन दिया।
तत्पश्चात राक्षसों का वध हेतु श्री माता ने विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया श्री माता का यही रूप मातंगी मोढेशवरी के रूप में अवतरित हुआ। मातंगी लाल रंग के वस्त्र धारण करती है , सिंह की सवारी करती है लाल होठ वाली व अत्यंत स्वरुपवादी होती है । मातंगी लाल पादुका, लाल माला, धारण करती है।
हातो में धनुषबाण , खेटक,खड़क, कुल्हाड़ी, गर्डर, परिंह, शंख , घाट, पाश, कतार, छत्र , त्रिशूल, मद्यपात्र, अक्षमाला, शक्ति तोमर, महा कुम्भ आदि अपने हाथो में धारण करती है। मातंगी माता कढ़े व बाजुबंध पहनती है । श्वान ( कुते ) को अपने साथ रखती है। श्री मातंगी इसी रूप में आज मोढेरा में मोदेश्वरी माता के रूप में साक्षात् विद्यमान है। माता मातंगी के ऐसे स्वरुप को देख कर्नाट राक्षस मोहवश हुआ , और उसने मातंगी के समक्ष अघटित मांग रखी परन्तु देवी ने तो उसे ललकार कर युद्ध शुरू किया और अंत में कर्नाट राक्षस का वध किया । इसी वध से प्रसन्न होकर विद्रो और वणिको ने माता मातंगी की स्तुति करी। मातंगी ने कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में मातंगी की स्तुति व पूजा करने की आज्ञा दी। विशेष रूप से माघ मास की कृष्ण तृतीया के दिन मातंगी की वटवृक्ष के नीचे पूजा करने का विशेष महत्व है। इस पूरी कथा के फल स्वरुप कहा जा सकता है। की :-
📝 इस पावन कथा के मुख्य निष्कर्ष एवं विधान
- 1. मोड़ ब्राह्मणों के इष्टदेव श्री राम है और उन्होंने ही हनुमान जी को मोड़ समाज की रक्षा हेतु मातंगी के निवास स्थल मोढेरा पर संरक्षक के रूप में नियुक्त किया है।
- 2. मोड़ समाज की कुलदेवी मातंगी देवी है जिन्होंने राक्षसों के विनाश के लिए विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया है। वो मातंगी मोदेश्वरी अठारह भुजा वाली है जिनका पूजन कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में करना चाहिए ।
- 3. चेत्री तथा अश्विनी दोनों ही नवरात्री में उपवास और मातंगी की पूजा करने का मोड़ ब्राह्मणों का विधान है ।
- 4. मोड़ ब्राह्मन मूल रूप से गुजरात के निवासी है।
🏹 प्रभु श्री राम का आगमन एवं सूर्य मंदिर इतिहास
श्री राम द्वारा रावन की ब्रह्म हत्या हुई जिसके प्रायाषित हेतु श्री राम ने कुल गुरु वशिष्ट से पूछा तब गुरु वशिष्ट ने उतर दिया की आप तो स्वयं भगवान के अवतार हो। परन्तु राम के अतिआग्रह के वश में होकर कुल गुरु वशिष्ट ने कहा की सभी विधि विधान मन की शुद्धी के लिए ही होते है परन्तु फिर भी पृथ्वी की ऊपर एक धर्मरान्य नाम का एक श्रेठ तीर्थ है। वहा यमराज , सूर्य पुत्र ( शनि) , सूर्य पत्नी ( संज्ञा ) ने भी तप किया है यही स्थल ब्रह्म हत्या की निवृति हेतु श्रेठ है। धर्मरान्य में प्रभु श्री राम पूरे परिवार के साथ प्रवेश कर रहे थे तभी उनके विमान, हाथी , घोडे आदि अचानक रुक गए। श्री राम ने गुरु वशिष्ट से कारण पूछा तो कुलगुरु वशिष्ट ने बताया की धर्मरान्य में पैदल चल कर जाना चाहिए यहाँ मातंगी का वास है। तब श्री राम ने सुवर्ण नदी के किनारे विशाल पढाव दिया और वहा अपने विमान, घोडे, हाथी आदि को रोका ।
नदी में स्नान विधि करी और पैदल चल कर मातंगी के दर्शन किये और देवी की अनुशंसा से धर्मरान्य का जीर्णोधार करने का संकल्प लिया । श्री राम त्रिमूर्ति अर्थात ब्रह्मा , विष्णु , महेश की आराधना करते है तीनो देवताओ ने वहा प्रकट होकर ब्राह्मणों को दान देने की बात कही । तभी तीनो देवो की उपस्थिति में ही धर्मरान्य का जीर्णोधार और भव्य प्रसाद का निर्माण कार्य शुरू किया। श्री राम ने ब्राह्मणों को ५५ गाँव दान में दिए । तत्पश्चात हनुमान जी वेश्य को लेकर आये एवं खेतो में खेती का कार्य आरम्भ किया । श्री राम ने धर्मरान्य के पुनरुधार के संस्मरण में मोड़ वणिको को एक खड़क और दो चम्मर भेट किये। उसी दिन से विवाह के समय वर अपने पास एक तलवार और दो चम्मर रखता है।
श्री राम ने अनेक मंदिरों का जीर्णोधार किया । बकुल के वृक्ष के नीचे जहा सूर्य पत्नी संज्ञा ने तप किया था वहा श्री राम ने बहुलार्क नाम का सूर्य का भव्य मंदिर बनाया। जहा पर श्री राम के हाथो ही कुलस्वामी सूर्य की मूर्ति की स्थापना की गयी। आज भी सूर्य मंदिर के अवशेष यथारूप में उपस्थित है और उनकी शिल्प और कलाकृति बेजोड़ और अत्यंत ही दुर्लभ है। इस सूर्य मंदिर को देख कर ये अनुमान लगाया जा सकता है की ये ११ वि शताब्दी में ही निर्मित हुआ होगा।
🛡️ ऐतिहासिक संघर्ष, विभाजन एवं मोढेरा का युद्ध
मोहेक्पुर में कन्या कुंज कन्नोज नाम के रजा का राज इस प्रदेश पर शुरू हुआ। वह राजा पराक्रमी था उसने वैष्णव धर्म को छोड़ बोद्ध धर्म को स्वीकार किया। बोद्ध गुरुओं की उपदेशो से वहा की प्रजा भी बोद्ध धर्म स्वीकार करने लगी। राजा ने अपनी पुत्री रत्न गंगा का विवाह वल्लभी राजा के साथ किया । उसने ब्राह्मणों के अधिकार छीन लिए ब्राह्मणों ने श्री राम चन्द्र जी के ताम्र पत्रों पर लिखे हुए दान पत्र भी बताये पर राजा नहीं माना । उसने कहा की तुम्हारे रक्षक हनुमान जी है उन्ही के पास से भूमि ले लेना। सभी ब्राह्मन धर्मरान्य वापस आये । चतुर दलीय करने वाले ब्राह्मन चतुर्विद, अर्थात चतुविधि के नाम से जाने जाते है। चतुविधि ब्रह्म समाज के १५ हज़ार में से २० तथा ३ हज़ार त्रेवाधेया के ११ इस प्रकार कुल ३१ ब्राह्मन रामेश्वर पहुचे ।
चतुर्वेदी ब्राह्मन वापस आ गए और बाकी के त्रेवैद्य ब्राह्मन अनेक संकट सहते हुए रामेश्वर पहुचे। विद्रोहियों के आक्रमण से प्राचीन पूरण प्रसिद्ध मोढेरा नगरी खंडरो में तब्दील हो गयी। प्रजा और बस्ती अलग अलग दिशा में बिखर गयी इनमे जो अदालाज़ गाँव में गए वो अद्लाजा कहलाये जो मांडल गाँव में गए वो मान्दलिये कहलाये । इस प्रकार अदालजा व मंडलीय दोनों ही जगह निवासरत लोग मुख्यतः तो वणिक ही थे । खेती करने वाले लोग पटेल की जाती से जाने गए तेल का काम करने वाले लोग चंपा नेरी मोड़ और नाव चलाने वाले लोग मधुकर मोड़ जाती के नाम से जाने गए।
समय गुजरता गया और गुजरात के राजपूत राजा करण देव वाघेला, दिलली के अल्लोउद्दीन खिलजी , अलफ खान सेनापति के हाथो यह राजा परस्त हुआ संवत १३५६ में गुजरात में मुस्लिम राज सत्ता आई और गुजरात के मंदिर टूटने लगे मोढेरा के मोड़ ब्राह्मन केवल वेद पाठ करने वाले ही नहीं थे वे तो विपरीत परिस्थितियों में स्वयं और परिवार की रक्षा हेतु भी वचन बध थे। मोड़ ब्राह्मणों में जयेष्ट मल्ल ब्राह्मन तो वज्र मुष्टि पहलवान थे और सेना में भी मुख्य थे। सम्पूर्ण मोढेरा गाँव ने मुस्लिन सेना का डट कर सामना किया ।
मंदाव्य गोत्र के पराक्रमी ब्राह्मन सुभट विठलेश्वर मोड़ ने मोड़ ब्राह्मणों की सेना संगठित की और ६ माह में शत्रुओ को थका दिया। तत्पश्चात दोनों ही सेना में सुलह हुई और फेसला हुआ की ब्राह्मन मुस्लिमो को पांच हज़ार सोने की मोहर दे तो मुस्लिम अपने घर हटाकर जमीन खाली करने को तैयार है। इस प्रकार सुलह होने पर मोढेरा गाँव के दरवाजे खोल दिए गए। आखिर में मोड़ ब्राह्मणों के साथ धोखा हुआ मुस्लिम सेनिको ने मोढेरा को लुट लिया , सूर्य मंदिर को तोड़ दिया , और मातंगी माता की मूर्ति को खंडित करने हेतु आ ही रहे थी इस भय से ब्राह्मणों ने मातंगी मूर्ति को जमीं में गहरी सुरंग ( वाव ) कर मातंगी मूर्ति को लोहे की चैन से बांधकर उसमे समाहित कर दिया । मातंगी मूर्ति को समाहित करने वाली यह वाव ही धर्मवाव के रूप में प्रसिद्ध हुई जो आज भी मोढेरा में यथावत है। जिस दिन मातंगी मूर्ति सुरंग में भेजी गयी उस दिन धुलेटी का दिन था।
🚂 गायकवाड़ शासन, अडिग संकल्प एवं प्राण प्रतिष्ठा
गुजरात में गायकवाड सरकार की सत्ता में धार्मिक स्थलों की अवनति रुक गयी तथा इस समय मोड़ ब्राह्मन मोढेरा, मालवा, उज्जैन, इंदौर, भोपाल आदि शेहरो में बसने लगे । सयाजी राव गायकवाड ने रेलवे लाइन को मोढेरा तक बनवाया जिससे भक्त आसानी से मातंगी धाम तक पहुच सके । इसी बीच नाथुलाल गिरधारी लाल पारीख ने यह संकल्प लिया की जब तक मातंगी मंदिर का जीर्णोधार नहीं होता तब तक वे सर पर पगड़ी और पैर में मोजडी धारण नहीं करेंगे । ब्रिटिश राज्य में बड़ोदरा शहर की कायाकल्प हेतु लाटरी निकली गयी एवं चंदा एकत्रित किया गे। संवत १८६२ में जीर्णोधार प्रारंभ किया गया विक्रम संवत १८६६ महा सूद की १३ वे दिन अर्थात तेरस के दिन मातंगी माता की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का दिन आया । दो समर्थ विद्वान् जामनगर निवासी शास्त्री जी हाथी भाई हरी शंकर और अहमदावाद निवासी शास्त्रीजी रामकृष्ण हर्ष जी के हाथो विधि विधान से मातंगी की प्राण प्रतिष्ठा गयी इसी दिवस को महसूद १३ दिवस अर्थात तेरस के दिन मातंगी का पाटोत्सव आयोजित किया जाता है।
🔮 मातंगी साधना एवं आराधना का महाफल
शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी की साधना से साधक को अष्टऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गृहस्थ जीवन में आ रहे क्लेश, दरिद्रता और शत्रुओं के दमन के लिए मातंगी पूजा अचूक मानी जाती है। जो भक्त मोढ़ेश्वरी माता के इस प्राकट्य स्थल (मोढेरा) का श्रद्धापूर्वक ध्यान करते हैं, माँ उनकी वाणी में ओज और जीवन में राजसी वैभव प्रदान करती हैं।
इस प्रकार आज दिन तक मातंगी की मूर्ति मोढेरा में उस वाव में ही समाहित है वर्षो बाद भी इसे उस वाव में से नहीं निकाला गया कारण यह की जिस समय ब्राह्मणों द्वारा इस मूर्ति को वाव में समाहित किया गया था तब ब्राह्मणों ने इस भय से की मुस्लिमो द्वारा इस मूर्ति को चैन खीचकर वाव में से निकाला नहीं जा सके इस हेतु माता मातंगी के समक्ष यह मनत रखी थी की जब तक मोड़ समाज के लोग मोढेरा में मातंगी के समक्ष एक साथ सवा लाख किलो नमक का भंडारे में उपयोग नहीं करेंगे तब तक मूर्ति को बाहर नहीं लाया जा सकेगा यही कारण है की आज भी मूर्ति उक्त वाव में ही है। मोढेरा भक्त मंडल द्वारा उक्त वाव के चारो और लोहे की जाली से स्थान को सुरक्षित किया गया है , एवं मातंगी धाम मोढेरा में मातंगी की उसी मूर्ति की प्रतिकृति के रूप में मातंगी की मूर्ति स्थापित की गयी ।