** या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थित । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमःया देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभुतेषु बुद्धि रूपेण थिथिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमःया देवी सर्वभूतेषू क्षान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

आरती माँ मातंगी देवी

आरती माँ मातंगी की🌞
ओम जय मातंगी मा (2) 
द्विजवर सुखकर सगी, धमांधुरा नदी ओम जयो जयो मा मातंगी मा 
विप्रमात तुं विष्णुशक्ति तुं द्विज्ज्न उध्धरती मा…(2) 
दया द्रष्टि करी प्रीते (2) द्विकुल भय हरती… ओम 
पंचावन पर स्वार, अष्टदश भुजधारी मा…(2) 
आयुध चक्र गदादि (2) प्रभुमय बलधारी… ओम 
निगम नीतिना वचन प्रमाणे, तुं मा धर्मतणी मा…(2) 
धर्मारण्यनी देवी (2) धर्मधरा वरती… ओम 
आर्यावर्तमां धर्म स्थापवा, अधर्मने पाप हरवा मा…(2) 
सितापति श्री रामे (2) श्रेय सकल करवा… ओम 
विष्णु विरंची शिवजी, तव अर्चन करता मा…(2) 
धर्म विद्यात्री तुजने (2) स्थापी शुभ करता… ओम 
शोभे सुंदर रूप, रत्न जडित पटथी मा…(2) 
स्मित मुख कमले ज्योति (2) करूणा द्रष्टिथी… ओम 
धर्मक्षेत्रनी अधिदेवी तुं मातंगी लक्ष्मी मा…(2) 
हरि नीकटे नीत वसती (2) तुं साक्षात लक्ष्मी मा…(2) 
हरिप्रिया तुं सत्य विभुति लक्ष्मीरूप धरा मा…(2) 
तव पद गुर्जर पावन (2) दश दिश वसुंधरा… ओम 
मोढेश्वरी तुं मोढ ज्ञातिनी काम दुधा माता मा…(2) 
मोढवृक्षना शीशुनी (2) तुं सर्जक माता… ओम 
त्रिगुणा तत्व मयी, चींतामणी फूलदा मा…(2) 
धर्म क्षेत्र धर्मेश्वरी (2) धर्मधरा वरदा… ओम 
यर्जु विधिथी पूजा, तुज विप्रो करता मा…(2) 
साम रूचायो भणता (2) प्रसन्नता वरदा…ओम 
आसुर विधि ने विप्र मा आरती जयकारीपूजन थाल ने विधि (2) 
तुज पर वारी…ओम 
मोढेश्वरीनी आरती जे कोई गाशे, मा जे भावे गाशे, 
दु:ख दरिद्र पापहरता, जन्म सफल थाशे…ओम
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मातंगी कवच / Matangi Kavach

मातंगी कवच / Matangi Kavach

श्री देव्युवाच

साधु-साधु महादेव। कथयस्व सुरेश्वर।
मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ॥

श्री-देवी ने कहा – हे महादेव। हे सुरेश्वर। मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रददिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए।

श्री ईश्वर उवाच

श्रृणु देवि। प्रवक्ष्यामि, मातंगी-कवचं शुभं।
गोपनीयं महा-देवि। मौनी जापं समाचरेत् ॥

ईश्वर ने कहा – हे देवि। उत्तम मातंगी-कवच कहता हूँ, सुनो। हे महा-देवि। इस कवच को गुप्त रखना, मौनी होकर जप करना।

विनियोग –

ॐ अस्य श्रीमातंगी-कवचस्य श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषिः । विराट् छन्दः । श्रीमातंगी देवता । चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यास

श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषये नमः शिरसि ।
विराट् छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीमातंगी देवतायै नमः हृदि ।
चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

मूल कवच-स्तोत्र

ॐ शिरो मातंगिनी पातु, भुवनेशी तु चक्षुषी ।
तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ॥
पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा ।
त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ॥
ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।
महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ॥
अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।
ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ॥
रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।
नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ॥
महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।
लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ॥
चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः ।
स-विसर्ग महा-देवि । हृदयं पातु सर्वदा ॥
नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।
उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ॥
उग्र-तारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।
भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ॥
जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका ।
विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ॥
नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ॥
रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।
ऊर्घ्वं पातु महा-देवि । देवानां हित-कारिणी ॥
पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।
प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ॥
मातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।
सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ॥

अर्थ

मातंगिनी देवी मेरे मस्तक की रक्षा करे, भुवनेश्वरी दो नेत्रों की, तोतला देवी दो कर्णों की, त्रिपुरा देवी मेरे बदन-मण्डल की, महा-माया मेरे कण्ठ की, माहेश्वरी मेरे हृदय की, त्रिपुरा दोनों पार्श्वों की और कामेश्वरी मेरे गुह्य-देश की रक्षा करे। चण्डी दोनों ऊरु की, रति-प्रिया जंघा की, महा-माया दोनों चरणों की और कुलेश्वरी मेरे सर्वांग की रक्षा करे। वैष्णवी सतत मेरे अंग-प्रत्यंग की रक्षा करे, मातंगी ब्रह्म-रन्घ्र में अवस्थान करके मेरी रक्षा करे। महा-पिशाचिनी बराबर मेरे ललाट की रक्षा करे, सुमुखी चक्षु की रक्षा करे, देवी नासिका की रक्षा करे।

महा-पिशाचिनी वदन के पश्चाद्-भाग की रक्षा करे, लज्जा मेरे दन्त की और सम्मार्जनी-हस्ता मेरे दो ओष्ठों की रक्षा करे। हे महा-देवि। तीन ‘ठं’ मेरे चिबुक और कण्ठ की और तीन ‘ठं’ सदा मेरे हृदय-देश की रक्षा करे। लीला माँ मेरे नाभि-देश की रक्षा करे, कालिका चक्षु की रक्षा करे, चामुण्डा जठर की रक्षा करे और कात्यायनी लिंग की रक्षा करे। उग्र-तारा मेरे गुह्य की, अम्बिका मेरे पद-द्वय की, शर्वाणी मेरे दोनों बाहुओं की और चण्ड-भूषण मेरे हृदय-देश की रक्षा करे।

मातृका रसना की रक्षा करे, पुष्टिका पूर्व-दिशा की तरफ, विजया दक्षिण-दिशा की तरफ और मेधा पश्चिम दिशा की तरफ मेरी रक्षा करे। श्रद्धा नैऋत्य-कोण की तरफ, लक्ष्मणा वायु-कोण की तरफ, शुभ-कारिणी मातंगी देवी ईशान-कोण की तरफ, सुवेशा अग्नि-कोण की तरफ, बाला उत्तर दिक् की तरफ और देव-वृन्द की हित-कारिणी महा-देवी ऊर्ध्व-दिक् की तरफ रक्षा करे। विश्व-रुपिणि वशिनी सर्वदा पाताल में मेरी रक्षा करे। “ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंगिन्यै फट् स्वाहा” – यह सार्द्धेकादश-वर्ण-मन्त्रमयी मातंगी सतत सकल स्थानों में मेरी रक्षा करे।

फल-श्रुति

इति ते कथितं देवि । गुह्यात् गुह्य-तरं परमं ।
त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ॥
यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।
परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥
गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि ।
ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥
नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ये देवा सुर-सत्तमाः ॥
ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः ।
तं दृष्ट्वा साधकं देवि । लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ॥
कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।
राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ॥
सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः ।
इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ॥
झल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।
गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ॥

हे देवि। तुमसे मैंने यह “त्रैलोक्य-मोहन” नाम का अति गुह्य देव दुर्लभ कवच कहा है। जो नित्य इसका पाठ करता है, वह सम्पत्ति का आधार होता है और अतुल परमैश्वर्य प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। यथा-विधि गुरु-पूजा करके उक्त कवच का पाठ करने से ऐश्वर्य, सु-कवित्व और वाक्-सिद्धि निश्चय ही प्राप्त की जा सकती है। मातंगी उसे नित्य नारी-संग दिलाती है। हे देवि। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, दूसरे प्रधान देव-वृन्द, ब्रह्म-राक्षस, वैताल, ग्रह आदि भूत-गण उस साधक को देखकर लज्जित होते हैं।

जो व्यक्ति इस कवच को धारण करता है, वह सर्व-सिद्धियाँ लाभ करता है। नृपति-गण उसका दासत्व करते हैं। वह षट्-कर्म साधन कर सकता है। अधिक क्या, वह सर्वत्र सिद्ध होता है। इस कवच को न जानकर, जो मातंगी की पूजा करता है, वह अल्पायु, धन-हीन और मूर्ख होता है। गुरु-भक्ति सर्वदा परमावश्यक है। इस कवच पर भी दृढ़ मति अर्थात् पूर्ण विश्वास रखना परम कर्तव्य है। फिर मातंगी देवी सर्व-सिद्धियाँ प्रदान करती है।

माँ मातंगी स्तोत्र || Matangi Stotra

मातङ्गीं मधुपानमत्तनयनां मातङ्ग सञ्चारिणीं 
कुम्भीकुम्भविवृत्तपीवरकुचां कुम्भादिपात्राञ्चिताम् । 

 ध्यायेऽहं मधुमारणैकसहजां ध्यातुस्सुपुत्रप्रदां 
शर्वाणीं सुरसिद्धसाध्यवनिता संसेविता पादुकाम् ॥ १॥ 

 मातङ्गी महिषादिराक्षसकृतध्वान्तैकदीपो मणिः 
मन्वादिस्तुत मन्त्रराजविलसत्सद्भक्त चिन्तामणिः । 

 श्रीमत्कौलिकदानहास्यरचना चातुर्य राकामणिः 
देवित्वं हृदये वसाद्यमहिमे मद्भाग्य रक्षामणिः ॥ २॥ 

 जयदेवि विशालाक्षि जय सर्वेश्वरि जय । 
जयाञ्जनगिरिप्रख्ये महादेव प्रियङ्करि ॥ ३॥ 

 महाविश्वेश दयिते जय ब्रह्मादि पूजिते । 
पुष्पाञ्जलिं प्रदास्यामि गृहाण कुलनायिके ॥ ४॥ 

 जयमातर्महाकृष्णे जय नीलोत्पलप्रभे । 
मनोहारि नमस्तेऽस्तु नमस्तुभ्यं वशङ्करि ॥ ५॥ 

 जय सौभाग्यदे नॄणां लोकमोहिनि ते नमः । 
सर्वैश्वर्यप्रदे पुंसां सर्वविद्याप्रदे नमः ॥ ६॥ 

 सर्वापदां नाशकरीं सर्वदारिद्रयनाशिनीम् । 
नमो मातङ्गतनये नमश्चाण्डालि कामदे ॥ ७॥ 

 नीलाम्बरे नमस्तुभ्यं नीलालकसमन्विते । 
नमस्तुभ्यं महावाणि महालक्ष्मि नमोस्तुते ॥ ८॥ 

 महामातङ्गि पादाब्जं तव नित्यं नमाम्यहम् । 
एतदुक्तं महादेव्या मातङ्गयाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ ९॥ 

 सर्वकामप्रदं नित्यं यः पठेन्मानवोत्तमः ।
 विमुक्तस्सकलैः पापैः समग्रं पुण्यमश्नुते ॥ १०॥ 

 राजानो दासतां यान्ति नार्यो दासीत्वमाप्नुयुः । 
दासीभूतं जगत्सर्वं शीघ्रं तस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ ११॥

 महाकवीभवेद्वाग्भिः साक्षाद् वागीश्वरो भवेत् । 
अचलां श्रियमाप्नोति अणिमाद्यष्टकं लभेत् ॥ १२॥ 

 लभेन्मनोरथान् सर्वान् त्रैलोक्ये नापि दुर्लभान् । 
अन्ते शिवत्वमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३॥ 

 श्रीराजमातङगी पादुकार्पणमस्तु । । 
इति श्रीमातङ्गीस्तोत्रं सपूर्णम् ।

मातंगी मंदिर दिव्य नक्षत्र वाटिका- Nakshatra Vatika

दिव्य नक्षत्र वाटिका

आध्यात्मिक और वानस्पतिक वैभव का जीवंत लोक

nakshatra-vatika-logo

झाबुआ के पावन सिद्धपीठ बालाजी धाम परिसर में 22 हजार वर्ग फीट के विशाल भूभाग पर 4 मई 2017 को अलौकिक 'दिव्य नक्षत्र वाटिका' की स्थापना की गई थी। पूर्णतः आध्यात्मिक पद्धति से निर्मित यह देश की दूसरी सबसे बड़ी व विशिष्ट वाटिका मानी जाती है। यहाँ ब्रह्मांडीय ऊर्जा को संतुलित करने वाले ऐसे दुर्लभ पौधे सहेजे गए हैं, जो सीधे तौर पर विभिन्न ग्रहों व नक्षत्रों के पूजन अनुष्ठानों में उपयोग किए जाते हैं।

वर्तमान में इस अनुपम वाटिका को वैश्विक स्तर का सौंदर्य प्रदान करने के लिए सीधे **आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध नर्सरियों** से विशेष आकर्षक फूल और दुर्लभ पौधों की प्रजातियाँ मंगवाई जा रही हैं। यहाँ **27 नक्षत्र और 9 ग्रहों** का प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट रोपण के साथ-साथ चारों ओर दिव्य हरियाली का अनूठा ताना-बाना बुना गया है।

मातंगी मंदिर दिव्य नक्षत्र वाटिका- Nakshatra Vatika ✨ 200 फीट की ऊंचाई से नक्षत्र वाटिका का विहंगम व मनोहारी नज़ारा ✨
अंतर्राष्ट्रीय एवं दुर्लभ प्रजातियाँ

इस अलौकिक वाटिका में दो भिन्न देशों के गौरवशाली **राष्ट्रीय वृक्षों** का एक साथ मिलन देखने को मिलता है—जिसमें भारत का सनातन पूजनीय **वट वृक्ष** और श्रीलंका का राजसी **नाग केसर** शामिल हैं। इसके अलावा देश के सुदूर क्षेत्रों जैसे शिलांग से लाई गई विशेष 'बेत' नामक औषधि, जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों के चीड़, और झालावाड़, आगर, इंदौर, दिल्ली व खरगोन से लाई गई अनूठी पुष्पीय प्रजातियाँ यहाँ की हवाओं को सुवासित कर रही हैं।

🌸 भगवान तिरुपति का परम प्रिय 'सोन चम्पा'

समिति के मुख्य सूत्रधार विशाल त्रिवेदी व पंडित हिमांशु शुक्ल के अनुसार, दक्षिण भारत के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भगवान वेंकटेश बालाजी को जिस विशेष सोन चम्पा की सुगंधित माला अर्पित की जाती है, उस दिव्य वृक्ष को यहाँ विशेष यत्न से रोपा गया है, जो अब पूर्ण परिपक्व होकर महक रहा है।

आंध्र प्रदेश के फूलों से महकेगा प्रांगण

वर्तमान में वाटिका की भव्यता को चार चांद लगाने के लिए पाँच अलग-अलग दुर्लभ प्रजातियों के गुलाब (हैदराबादी, झालावाड़ के विशेष गुलाब, चमेली और मोगरा) विकसित किए गए हैं। विद्या की देवी माँ सरस्वती की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माने जाने वाले लेवेंडर, गूगल, देशी कपूर, सफेद शमी, और रजनीगंधा के कारण पूरी वाटिका में चौबीसों घंटे एक दिव्य आध्यात्मिक खुशबू छाई रहती है।

🌿 औषधि व नवग्रह वृक्ष

  • रक्त चंदन व रूद्राक्ष
  • सफेद खैर व शमी
  • देशी कपूर व सिंदूर
  • गूगल, कुचला व चीड़
  • पीपल, साल व बकुल
  • कदम्ब, अरीठा व सुपारी

🌸 दिव्य पुष्प प्रजातियाँ

  • राजसी सोनचम्पा
  • अखंड गज मोगरा
  • रातरानी व जूही
  • वसंत मालती व कुंद
  • एगजोरा व नट
  • 5 प्रकार के शाही गुलाब

💡 विशेषता: यहाँ स्थित 'गज मोगरा' की यह विलक्षण विशेषता है कि यह किसी खास मौसम में नहीं बल्कि पूरे वर्ष (12 महीने) अपनी कलियों से लदकर खिलता रहता है। इस संपूर्ण वाटिका की निस्वार्थ सेवा व रख-रखाव **50 समर्पित सदस्यों की समिति** द्वारा नित्य किया जाता है।

🎯 वाटिका का मुख्य उद्देश्य:
भारत की समृद्ध सांस्कृतिक व वानस्पतिक विरासत को पुनर्जीवित करना तथा झाबुआ अंचल में एक ऐसा आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र विकसित करना है, जो सनातन संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक पर्यटन को एक सूत्र में पिरो सके।

मातंगी देवी इतिहास- मोढ़ेश्वरी माता मंदिर

माँ मातंगी देवी (मोढ़ेश्वरी माता) का विस्तृत इतिहास और पौराणिक महत्व

🔱 महाविद्या प्राकट्य एवं स्वरूप
मातंगी देवी इतिहास- matangi maa history- matangi mata history in hindi-

भारत की दिव्य शक्ति त्रिकोण में — महाविद्या त्रिपुरा सुंदरी, मातंगी और कामला का विशेष स्थान है। इनमें माँ मातंगी देवी दस महाविद्याओं में से एक हैं। उन्हें तांत्रिक स्वरूप की सरस्वती भी कहा जाता है। माँ मातंगी ज्ञान, वाणी, संगीत, कला और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। श्री मातंगी देवी अर्थात राजमाता दस महाविद्याओ की एक देवी है। मोड़ ब्राह्मन की कुल देवी है । मोहकपुर की मुख्या अधिष्टाता है देवी मातंगी की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है।

जिस प्रकार त्रेता युग में सत्य मंदिर, द्वापर युग में वेद्भुवन, कलयुग में मोहेसपुर जग प्रसिद्ध ही उसी प्रकार मध्य कल में मोढेरा के रुप में मातंगी का यह स्थान जग प्रसिद्ध हुआ । श्री ब्रह्मा जी ने स्वयं के मुख से श्री माता को प्रकट किया है। मोहकपुर में बसे हुए ब्राह्मणों की रक्षा हेतु श्री माता की स्थापना की गयी। श्री माता के हाथो में पुस्तक, कमंडल होती है, वस्त्र श्वेत अर्थात सफ़ेद होते है ये महालक्ष्मी और रुद्राणी भी कहलाती है।

✨ मातंगी स्वरूप का तांत्रिक एवं तात्विक विवेचन

तंत्र शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी दस महाविद्याओं में नवम (9वीं) स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। इन्हें 'राज-मातंगी', 'मंत्रिणी देवी' और 'श्यामला देवी' के नाम से भी पुकारा जाता है। देवी का यह अलौकिक स्वरूप ब्रह्मांड की ६४ कलाओं (64 Arts) का स्वामी है। जहाँ माता सरस्वती केवल बाहरी ज्ञान और विद्या की देवी हैं, वहीं माँ मातंगी अंतर्मन की गहरी समझ, गुप्त शक्तियों, वाक्-सिद्धि (Vaksiddhi) और ब्रह्मांडीय नाद की अधिष्ठात्री हैं। बुद्ध ग्रह की अधिष्ठात्री होने के कारण वे तीक्ष्ण बुद्धि और आकर्षण शक्ति (Vashikaran Shakti) प्रदान करती हैं।

॥ महाकवि कालिदास कृत श्यामल दंडकम ध्यानम् ॥
माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलापाम् ।
मातङ्गतनूजां शशिशेखराधारां स्मरामि सर्वेश्वरवामभागम् ॥

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती ने एक बार चांडाल (उच्छिष्ट) रूप धारण कर परस्पर लीला की थी, तब देवी का यह स्वरूप प्रकट हुआ था। इसी कारण इन्हें 'उच्छिष्ट चंडालिनी' भी कहा जाता है। वे सामाजिक बंधनों से परे, वन और प्रकृति की अनंत ऊर्जा में वास करती हैं।

⚔️ कर्नाट राक्षस का आतंक और मोढ़ेश्वरी अवतार

श्री माता की रक्षा कवच में वास करते करते ब्राह्मणों को सेकड़ो वर्ष बीत गए। तभी वहा कर्नाट नाम का एक राक्षस हुआ। यह राक्षस ब्राह्मणों को खूब परेशान करता और यज्ञ , पूजा विधान आदि में भारी विघ्न उत्पन्न करने लगा थक हार के सभी ब्राह्मन इस पीड़ा से मुक्ति हेतु श्री माता के पास पहुचे श्री माता ने सभी ब्राह्मणों को आशीर्वाद प्रदान कर राक्षसों का नाश करने का वचन दिया।

तत्पश्चात राक्षसों का वध हेतु श्री माता ने विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया श्री माता का यही रूप मातंगी मोढेशवरी के रूप में अवतरित हुआ। मातंगी लाल रंग के वस्त्र धारण करती है , सिंह की सवारी करती है लाल होठ वाली व अत्यंत स्वरुपवादी होती है । मातंगी लाल पादुका, लाल माला, धारण करती है।

हातो में धनुषबाण , खेटक,खड़क, कुल्हाड़ी, गर्डर, परिंह, शंख , घाट, पाश, कतार, छत्र , त्रिशूल, मद्यपात्र, अक्षमाला, शक्ति तोमर, महा कुम्भ आदि अपने हाथो में धारण करती है। मातंगी माता कढ़े व बाजुबंध पहनती है । श्वान ( कुते ) को अपने साथ रखती है। श्री मातंगी इसी रूप में आज मोढेरा में मोदेश्वरी माता के रूप में साक्षात् विद्यमान है। माता मातंगी के ऐसे स्वरुप को देख कर्नाट राक्षस मोहवश हुआ , और उसने मातंगी के समक्ष अघटित मांग रखी परन्तु देवी ने तो उसे ललकार कर युद्ध शुरू किया और अंत में कर्नाट राक्षस का वध किया । इसी वध से प्रसन्न होकर विद्रो और वणिको ने माता मातंगी की स्तुति करी। मातंगी ने कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में मातंगी की स्तुति व पूजा करने की आज्ञा दी। विशेष रूप से माघ मास की कृष्ण तृतीया के दिन मातंगी की वटवृक्ष के नीचे पूजा करने का विशेष महत्व है। इस पूरी कथा के फल स्वरुप कहा जा सकता है। की :-

📝 इस पावन कथा के मुख्य निष्कर्ष एवं विधान
  • 1. मोड़ ब्राह्मणों के इष्टदेव श्री राम है और उन्होंने ही हनुमान जी को मोड़ समाज की रक्षा हेतु मातंगी के निवास स्थल मोढेरा पर संरक्षक के रूप में नियुक्त किया है। 
  • 2. मोड़ समाज की कुलदेवी मातंगी देवी है जिन्होंने राक्षसों के विनाश के लिए विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया है। वो मातंगी मोदेश्वरी अठारह भुजा वाली है जिनका पूजन कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में करना चाहिए । 
  • 3. चेत्री तथा अश्विनी दोनों ही नवरात्री में उपवास और मातंगी की पूजा करने का मोड़ ब्राह्मणों का विधान है । 
  • 4. मोड़ ब्राह्मन मूल रूप से गुजरात के निवासी है। 
🏹 प्रभु श्री राम का आगमन एवं सूर्य मंदिर इतिहास

श्री राम द्वारा रावन की ब्रह्म हत्या हुई जिसके प्रायाषित हेतु श्री राम ने कुल गुरु वशिष्ट से पूछा तब गुरु वशिष्ट ने उतर दिया की आप तो स्वयं भगवान के अवतार हो। परन्तु राम के अतिआग्रह के वश में होकर कुल गुरु वशिष्ट ने कहा की सभी विधि विधान मन की शुद्धी के लिए ही होते है परन्तु फिर भी पृथ्वी की ऊपर एक धर्मरान्य नाम का एक श्रेठ तीर्थ है। वहा यमराज , सूर्य पुत्र ( शनि) , सूर्य पत्नी ( संज्ञा ) ने भी तप किया है यही स्थल ब्रह्म हत्या की निवृति हेतु श्रेठ है। धर्मरान्य में प्रभु श्री राम पूरे परिवार के साथ प्रवेश कर रहे थे तभी उनके विमान, हाथी , घोडे आदि अचानक रुक गए। श्री राम ने गुरु वशिष्ट से कारण पूछा तो कुलगुरु वशिष्ट ने बताया की धर्मरान्य में पैदल चल कर जाना चाहिए यहाँ मातंगी का वास है। तब श्री राम ने सुवर्ण नदी के किनारे विशाल पढाव दिया और वहा अपने विमान, घोडे, हाथी आदि को रोका ।

नदी में स्नान विधि करी और पैदल चल कर मातंगी के दर्शन किये और देवी की अनुशंसा से धर्मरान्य का जीर्णोधार करने का संकल्प लिया । श्री राम त्रिमूर्ति अर्थात ब्रह्मा , विष्णु , महेश की आराधना करते है तीनो देवताओ ने वहा प्रकट होकर ब्राह्मणों को दान देने की बात कही । तभी तीनो देवो की उपस्थिति में ही धर्मरान्य का जीर्णोधार और भव्य प्रसाद का निर्माण कार्य शुरू किया। श्री राम ने ब्राह्मणों को ५५ गाँव दान में दिए । तत्पश्चात हनुमान जी वेश्य को लेकर आये एवं खेतो में खेती का कार्य आरम्भ किया । श्री राम ने धर्मरान्य के पुनरुधार के संस्मरण में मोड़ वणिको को एक खड़क और दो चम्मर भेट किये। उसी दिन से विवाह के समय वर अपने पास एक तलवार और दो चम्मर रखता है।

श्री राम ने अनेक मंदिरों का जीर्णोधार किया । बकुल के वृक्ष के नीचे जहा सूर्य पत्नी संज्ञा ने तप किया था वहा श्री राम ने बहुलार्क नाम का सूर्य का भव्य मंदिर बनाया। जहा पर श्री राम के हाथो ही कुलस्वामी सूर्य की मूर्ति की स्थापना की गयी। आज भी सूर्य मंदिर के अवशेष यथारूप में उपस्थित है और उनकी शिल्प और कलाकृति बेजोड़ और अत्यंत ही दुर्लभ है। इस सूर्य मंदिर को देख कर ये अनुमान लगाया जा सकता है की ये ११ वि शताब्दी में ही निर्मित हुआ होगा।

🛡️ ऐतिहासिक संघर्ष, विभाजन एवं मोढेरा का युद्ध

मोहेक्पुर में कन्या कुंज कन्नोज नाम के रजा का राज इस प्रदेश पर शुरू हुआ। वह राजा पराक्रमी था उसने वैष्णव धर्म को छोड़ बोद्ध धर्म को स्वीकार किया। बोद्ध गुरुओं की उपदेशो से वहा की प्रजा भी बोद्ध धर्म स्वीकार करने लगी। राजा ने अपनी पुत्री रत्न गंगा का विवाह वल्लभी राजा के साथ किया । उसने ब्राह्मणों के अधिकार छीन लिए ब्राह्मणों ने श्री राम चन्द्र जी के ताम्र पत्रों पर लिखे हुए दान पत्र भी बताये पर राजा नहीं माना । उसने कहा की तुम्हारे रक्षक हनुमान जी है उन्ही के पास से भूमि ले लेना। सभी ब्राह्मन धर्मरान्य वापस आये । चतुर दलीय करने वाले ब्राह्मन चतुर्विद, अर्थात चतुविधि के नाम से जाने जाते है। चतुविधि ब्रह्म समाज के १५ हज़ार में से २० तथा ३ हज़ार त्रेवाधेया के ११ इस प्रकार कुल ३१ ब्राह्मन रामेश्वर पहुचे ।

चतुर्वेदी ब्राह्मन वापस आ गए और बाकी के त्रेवैद्य ब्राह्मन अनेक संकट सहते हुए रामेश्वर पहुचे। विद्रोहियों के आक्रमण से प्राचीन पूरण प्रसिद्ध मोढेरा नगरी खंडरो में तब्दील हो गयी। प्रजा और बस्ती अलग अलग दिशा में बिखर गयी इनमे जो अदालाज़ गाँव में गए वो अद्लाजा कहलाये जो मांडल गाँव में गए वो मान्दलिये कहलाये । इस प्रकार अदालजा व मंडलीय दोनों ही जगह निवासरत लोग मुख्यतः तो वणिक ही थे । खेती करने वाले लोग पटेल की जाती से जाने गए तेल का काम करने वाले लोग चंपा नेरी मोड़ और नाव चलाने वाले लोग मधुकर मोड़ जाती के नाम से जाने गए।

समय गुजरता गया और गुजरात के राजपूत राजा करण देव वाघेला, दिलली के अल्लोउद्दीन खिलजी , अलफ खान सेनापति के हाथो यह राजा परस्त हुआ संवत १३५६ में गुजरात में मुस्लिम राज सत्ता आई और गुजरात के मंदिर टूटने लगे मोढेरा के मोड़ ब्राह्मन केवल वेद पाठ करने वाले ही नहीं थे वे तो विपरीत परिस्थितियों में स्वयं और परिवार की रक्षा हेतु भी वचन बध थे। मोड़ ब्राह्मणों में जयेष्ट मल्ल ब्राह्मन तो वज्र मुष्टि पहलवान थे और सेना में भी मुख्य थे। सम्पूर्ण मोढेरा गाँव ने मुस्लिन सेना का डट कर सामना किया ।

मंदाव्य गोत्र के पराक्रमी ब्राह्मन सुभट विठलेश्वर मोड़ ने मोड़ ब्राह्मणों की सेना संगठित की और ६ माह में शत्रुओ को थका दिया। तत्पश्चात दोनों ही सेना में सुलह हुई और फेसला हुआ की ब्राह्मन मुस्लिमो को पांच हज़ार सोने की मोहर दे तो मुस्लिम अपने घर हटाकर जमीन खाली करने को तैयार है। इस प्रकार सुलह होने पर मोढेरा गाँव के दरवाजे खोल दिए गए। आखिर में मोड़ ब्राह्मणों के साथ धोखा हुआ मुस्लिम सेनिको ने मोढेरा को लुट लिया , सूर्य मंदिर को तोड़ दिया , और मातंगी माता की मूर्ति को खंडित करने हेतु आ ही रहे थी इस भय से ब्राह्मणों ने मातंगी मूर्ति को जमीं में गहरी सुरंग ( वाव ) कर मातंगी मूर्ति को लोहे की चैन से बांधकर उसमे समाहित कर दिया । मातंगी मूर्ति को समाहित करने वाली यह वाव ही धर्मवाव के रूप में प्रसिद्ध हुई जो आज भी मोढेरा में यथावत है। जिस दिन मातंगी मूर्ति सुरंग में भेजी गयी उस दिन धुलेटी का दिन था।

🚂 गायकवाड़ शासन, अडिग संकल्प एवं प्राण प्रतिष्ठा

गुजरात में गायकवाड सरकार की सत्ता में धार्मिक स्थलों की अवनति रुक गयी तथा इस समय मोड़ ब्राह्मन मोढेरा, मालवा, उज्जैन, इंदौर, भोपाल आदि शेहरो में बसने लगे । सयाजी राव गायकवाड ने रेलवे लाइन को मोढेरा तक बनवाया जिससे भक्त आसानी से मातंगी धाम तक पहुच सके । इसी बीच नाथुलाल गिरधारी लाल पारीख ने यह संकल्प लिया की जब तक मातंगी मंदिर का जीर्णोधार नहीं होता तब तक वे सर पर पगड़ी और पैर में मोजडी धारण नहीं करेंगे । ब्रिटिश राज्य में बड़ोदरा शहर की कायाकल्प हेतु लाटरी निकली गयी एवं चंदा एकत्रित किया गे। संवत १८६२ में जीर्णोधार प्रारंभ किया गया विक्रम संवत १८६६ महा सूद की १३ वे दिन अर्थात तेरस के दिन मातंगी माता की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का दिन आया । दो समर्थ विद्वान् जामनगर निवासी शास्त्री जी हाथी भाई हरी शंकर और अहमदावाद निवासी शास्त्रीजी रामकृष्ण हर्ष जी के हाथो विधि विधान से मातंगी की प्राण प्रतिष्ठा गयी इसी दिवस को महसूद १३ दिवस अर्थात तेरस के दिन मातंगी का पाटोत्सव आयोजित किया जाता है। 

🔮 मातंगी साधना एवं आराधना का महाफल

शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी की साधना से साधक को अष्टऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गृहस्थ जीवन में आ रहे क्लेश, दरिद्रता और शत्रुओं के दमन के लिए मातंगी पूजा अचूक मानी जाती है। जो भक्त मोढ़ेश्वरी माता के इस प्राकट्य स्थल (मोढेरा) का श्रद्धापूर्वक ध्यान करते हैं, माँ उनकी वाणी में ओज और जीवन में राजसी वैभव प्रदान करती हैं।

इस प्रकार आज दिन तक मातंगी की मूर्ति मोढेरा में उस वाव में ही समाहित है वर्षो बाद भी इसे उस वाव में से नहीं निकाला गया कारण यह की जिस समय ब्राह्मणों द्वारा इस मूर्ति को वाव में समाहित किया गया था तब ब्राह्मणों ने इस भय से की मुस्लिमो द्वारा इस मूर्ति को चैन खीचकर वाव में से निकाला नहीं जा सके इस हेतु माता मातंगी के समक्ष यह मनत रखी थी की जब तक मोड़ समाज के लोग मोढेरा में मातंगी के समक्ष एक साथ सवा लाख किलो नमक का भंडारे में उपयोग नहीं करेंगे तब तक मूर्ति को बाहर नहीं लाया जा सकेगा यही कारण है की आज भी मूर्ति उक्त वाव में ही है। मोढेरा भक्त मंडल द्वारा उक्त वाव के चारो और लोहे की जाली से स्थान को सुरक्षित किया गया है , एवं मातंगी धाम मोढेरा में मातंगी की उसी मूर्ति की प्रतिकृति के रूप में मातंगी की मूर्ति स्थापित की गयी ।

मातंगी फोटो गेलेरी

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मातंगी मंदिर झाबुआ फोटो गेलेरी

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विडियो गेलेरी






चार धाम यात्रा

चार धाम यात्रा- matangi-darshan-jhabua-chaar-dhaam-yatra

 मातंगी ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष झाबुआ से यात्रा का आयोजन किया जाता है। जिसमें यात्रा में भाग लेने वाले भक्तो को चार धाम की यात्रा के साथ मॉ मातंगी  धाम की यात्रा भी कराई जाती है इस हेतु भक्तो से अतिन्युनतम शुल्क पर व उच्च गुणवत्ता युक्त सुविधाए प्रदान करते हुए उन्हे यात्रा का लाभ दिया जाता है। यह यात्रा प्रतिवर्ष नियोजीत परसमय पर ले जाई जाती है जिसके लिए यात्रा में शामिल होने वाले भक्तो की सुची बनाकर उस आधार पर आगामी कार्यक्रम नियोजित किएजाते है। 
            यह यात्रा 4 से 5 दिन की होती है परंतु तीर्थ स्थलो की संख्या एवं दुरी के हिसाब से समयावधि घट या बढ सकती है। यात्रा हेतु पुर्ण कार्यक्रम पुर्व नियोजीत होता है। यात्रा में बस मार्ग ,रेल मार्ग आदि का प्रयोग किया जाता है। धार्मिक स्थानो की दुरी अधिक होने के कारण संपुर्ण यात्रा बस मार्ग द्वारा ही करना संभव नही हो सकता है अतः इस हेतु विभिन्न वाहनो के द्वारा स्थलो तक पहुचना पडता है। स्थल तक पहुचने के बाद भक्तो को सभी सुविधाए जैसेः- भोजन ,ठहरना आदि सुविधाए निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है इस हेतु भक्तो से कोई अन्य राशि नही ली जाती है। 
      यात्रा में बुर्जुग भक्त भी होने के कारण यात्रा हेतु सबसे सुविधाजनक विकल्पो का इस्तेमाल किया जाता है जिससे की भक्तो को किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पडे। इस यात्रा में जाने हेतु भक्तो से केवल उनके दैनिक उपयोग की वस्तुओ को ही साथ लाने का आग्रह किया जाता है शेष संपुर्ण सुविधाए ट्रस्ट द्वारा ही उपलब्ध कराई जाती है। यात्रा में शामिल होने के लिए नियत समयावधि के अंदर ट्रस्ट से संपर्क कर यात्रा का लाभ किया जा सकता हैं ।

यात्रा फॉर्म डाउनलोड करे नीचे डाउनलोड लिंक पर क्लिक करे ।

फॉर्म को पूर्णतः भरकर हमे ईमेल करे ,
या ट्रस्ट के पते पर डाक द्वारा भेजे।

आगामी योजना

🚩 माँ मातंगी ट्रस्ट: आगामी संकल्प एवं नव-निर्माण योजनाएं
  • 1

    परिसर सौन्दर्यीकरण

    माँ मातंगी मंदिर निर्माण के पश्चात संपूर्ण परिसर का उत्कृष्ट कलाकृतियों और नक्काशीदार पत्थरों से भव्य सौन्दर्यीकरण करना।

  • 2

    सर्व ब्राह्मण समाज धर्मशाला

    बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और समाजजनों हेतु सर्व-सुविधायुक्त, आधुनिक एवं वातानुकूलित विशाल धर्मशाला का निर्माण करना।

  • 3

    अतिथिगृह एवं सर्वसुलभ भोजनालय

    परिसर में सुसज्जित अतिथिगृह तथा अत्यंत कम सहयोग राशि पर शुद्ध, सात्विक भोजन उपलब्ध कराने हेतु 'मातंगी अन्नपूर्णा भोजनालय' का प्रस्ताव।

  • 4

    भव्य मांगलिक कम्युनिटी हॉल

    विवाह परिचय सम्मेलन, यज्ञोपवीत संस्कार, शतचंडी महायज्ञ और सामूहिक आयोजनों में उमड़ने वाली भीड़ हेतु एक विशाल पक्के शेड/हॉल का निर्माण।

  • 5

    पहुंच मार्ग सुदृढ़ीकरण व प्रकाश व्यवस्था

    वर्तमान पथरीले व दुर्गम मार्ग की समस्या को दूर करने हेतु डामरीकरण/CC रोड का निर्माण तथा रात्रि गमन को सुरक्षित बनाने हेतु सोलर स्ट्रीट लाइट व्यवस्था।

  • 6

    रोजगार व युवा मार्गदर्शन केंद्र

    समाज के शिक्षित बेरोजगार युवक-युवतियों को स्वावलंबी बनाने हेतु रोजगार सेल की स्थापना, करियर काउंसलिंग और तकनीकी कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था।

  • 7

    सुनियोजित आयोजन रूपरेखा

    विवाह, सामूहिक यज्ञ व बड़े त्योहारों को सुचारू, विवाद-रहित और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने हेतु प्री-प्लानिंग (पूर्व-नियोजन) डेस्क की स्थापना।

  • 8

    नक्षत्र वाटिका एवं दिव्य बगीचा

    भक्तों के मानसिक सुकून और ध्यान हेतु मंदिर के पास औषधीय पौधों, सुगंधित फूलों और नक्षत्र वाटिका से युक्त एक सुंदर उपवन तैयार करना।

  • 9

    संस्कारशाला एवं डिजिटल हेल्पडेस्क

    आगामी समय में नई पीढ़ी को वेदों, सनातन संस्कृति और संगीत से जोड़ने हेतु 'मातंगी संस्कारशाला' तथा ऑनलाइन दर्शन व बुकिंग हेतु डिजिटल पोर्टल का संचालन।

🤝 इन सभी पुनीत कार्यों को निष्ठापूर्वक धरातल पर आकार देकर एक सुशिक्षित, समृद्ध और सुसभ्य समाज का निर्माण करना ही ट्रस्ट का परम लक्ष्य है।

दान करे

माता मोढ़ेश्वरी मंदिर – दान एवं सहयोग पृष्ठ

“आपका सहयोग माता की भक्ति और समाज की सेवा में स्थायी योगदान बन सकता है।”
🌸 पवित्र उद्देश्य

सम्माननीय स्वजातीय बंधुओं,

झाबुआ नगर में माता मोढ़ेश्वरी की असीम कृपा से माता मोढ़ेश्वरी मंदिर का निर्माण कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। यह मंदिर अब केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और समाजिक चेतना का प्रतीक बन गया है। मंदिर का पूरा निर्माण केवल श्रद्धालुओं के सहयोग और समाज के समर्पित सदस्यों की मेहनत से संभव हुआ। अब यह पवित्र स्थल भविष्य की पीढ़ियों के लिए भक्ति, सेवा और सामाजिक चेतना का केंद्र बन चुका है।

विगत वर्षों में समाज ने अनेक धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  1. निःशुल्क यज्ञोपवित संस्कार
  2. विधवा विवाह समारोह
  3. वैकुण्ठधाम रथ यात्रा
  4. माता का पाटोत्सव
  5. निराश्रित पेंशन वितरण
  6. प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहन

इन आयोजनों ने समाज में एकता, सहयोग और भक्ति की भावना को मजबूत किया है।

🏛 मातंगी परमार्थ ट्रस्ट – उद्देश्य और सामाजिक भूमिका

“मातंगी परमार्थ ट्रस्ट” झाबुआ का उद्देश्य केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं है। अब जब मंदिर निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, हमारा ध्यान समाज की निरंतर प्रगति, नवचेतना और सेवा कार्यों पर केंद्रित है।

मातंगी मंदिर डोनेशन
  • समाज की युवा पीढ़ी को शिक्षित, संस्कारित और सेवाभावी बनाना।
  • बेरोजगार युवाओं के लिए पाठशालाएँ और लघु उद्योग प्रशिक्षण।
  • विवाह योग्य वर-वधु के लिए मातंगी मैट्रीमोनी पोर्टल।
  • समाज के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को अकादमिक और सामाजिक प्रोत्साहन।
  • समाज में सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन, ताकि नई पीढ़ी को संस्कृति और परंपरा से जोड़ें।

ट्रस्ट का यह प्रयास समाज को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सशक्त बनाने में सहायक है।

💡 सहयोग का महत्व

मंदिर अब बन चुका है, लेकिन समाज में नए विकास और सेवा कार्य के लिए सहयोग की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। आपका योगदान:

  • मंदिर के आसपास के सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए स्थायी संसाधन उपलब्ध कराता. है।
  • समाज के शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार संबंधी योजनाओं के विस्तार में मदद करता है।
  • आने वाली पीढ़ियों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनाए रखता है।
  • आपकी भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक बनता है, जो समाज में सकारात्मक प्रभाव डालता है।
📌 सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

दान केवल धार्मिक कार्य नहीं है। यह समाज में एकता, समर्पण और सेवा का संदेश देता है। मातंगी परमार्थ ट्रस्ट के प्रयासों से अब तक समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं:

  • युवा पीढ़ी में शिक्षा और संस्कार बढ़े।
  • बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार सृजन हुआ।
  • विधवा विवाह, नि:शुल्क संस्कार और अन्य सामाजिक कार्यक्रम संचालित हुए।
  • समाज में नवचेतना और सामाजिक चेतना का प्रसार हुआ।
आपका योगदान इन प्रयासों का हिस्सा बनता है और इसे भविष्य में और व्यापक स्तर पर विस्तारित किया जा सकेगा।

माता मोढ़ेश्वरी मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन अब यह समाज के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका है। मातंगी परमार्थ ट्रस्ट इस पवित्र कार्य में आपकी सहभागिता और सहयोग की अपेक्षा करता है। आपका योगदान इस पवित्र कार्य में अमूल्य है। आइए, हम सभी मिलकर झाबुआ नगर और समाज के लिए सशक्त, शिक्षित और धर्मपरायण समुदाय का निर्माण करें।

माता मोढ़ेश्वरी की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे।

🙏 मातंगी माता की असीम कृपा से निर्मित इस भव्य धाम में, आपका हर योगदान एक दिव्य आशीर्वाद बनकर समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचेगा।

मातंगी ट्रस्ट सदैव इस उद्देश्य से कार्यरत रहा है कि धार्मिक स्थल केवल पूजा का स्थान न होकर, समाज के उत्थान और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का केंद्र भी बने। मंदिर प्रांगण में विशाल पांडाल, नक्षत्र वाटिका, बालाजी-हनुमान मंदिर, स्फटिक शिवलिंग के साथ शिवमंदिर, तालाब और धर्मशाला जैसी सुविधाएँ इसी संकल्प का प्रमाण हैं।

इन व्यवस्थाओं के संचालन और आने वाले समय में अतिथिगृह, भोजनालय, भव्य सभागार और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए आधुनिक ढाँचों के निर्माण हेतु आपके सहयोग की आवश्यकता है।

आपका दान सीधे ट्रस्ट के बैंक खाते में सुरक्षित रूप से जमा होगा। इस पेज पर आपको केवल वही तीन ज़रूरी जानकारी मिलेगी, जिनसे दान की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी बन सके: हमारा प्रयास है कि हर श्रद्धालु बिना किसी बाधा के इस दिव्य कार्य का हिस्सा बन सके। आपका हर अंशदान न केवल मंदिर की सेवा में लगेगा, बल्कि समाज में शिक्षा, संस्कार, संस्कृतियों और परंपराओं के संरक्षण में भी उपयोग किया जाएगा।

🙏 आपका सहयोग ही इस धाम की आत्मा है। माँ मातंगी आपके जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से परिपूर्ण करें।

ACCOUNT NUMBER IFSC CODE BRANCH NAME
30684703636 SBIN0000396 SBI, Jhabua

सुविधाए

मातंगी धाम – धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र

मातंगी मंदिर, झाबुआ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिकता का विशाल केंद्र बन चुका है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि वे प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक आयोजनों का भी अनुभव करते हैं।

🛕 वर्तमान संरचना और विशेष आकर्षण
1. विशाल पांडाल

मंदिर प्रांगण में एक विशाल पांडाल बना है, जहाँ नियमित रूप से विविध धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यह पांडाल भक्तों को एक साथ जोड़ने और सामूहिक भक्ति का अनुभव कराने का प्रमुख स्थल है।

2. नक्षत्र वाटिका

मंदिर प्रांगण का एक विशेष आकर्षण है नक्षत्र वाटिका, जिसमें सभी नौ ग्रहों के अनुरूप वृक्ष लगाए गए हैं। ज्योतिष और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार लगाए गए हजारों पौधे और वृक्ष यहाँ का वातावरण न केवल पवित्र बल्कि प्राकृतिक ऊर्जा से परिपूर्ण बनाते हैं।

3. विशाल तालाब

प्रांगण से सटा हुआ विशाल तालाब मंदिर की शोभा को और बढ़ाता है। यह तालाब भक्तों और आगंतुकों के लिए शांति और सुकून का स्थान है।

4. শ্রী बालाजी हनुमान मंदिर

मंदिर परिसर में ही श्री बालाजी हनुमान मंदिर की स्थापना की गई है। यहाँ प्रत्येक शनिवार और मंगलवार को सुंदरकाण्ड पाठ का आयोजन होता है। साथ ही हनुमान जयंती पर तीन दिवसीय भव्य कार्यक्रम संपन्न होते हैं, जिनमें हजारों भक्त उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।

5. विशाल शिव मंदिर

प्रांगण में ही स्फटिक शिवलिंग की स्थापना कर एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण किया गया है। यह मंदिर भक्तों को दिव्य शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कराता है।

🏨 भक्तों के लिए उपलब्ध सुविधाएँ
  1. आवास व्यवस्था: दर्शनार्थियों और समाज के लोगों के ठहरने हेतु उपयुक्त स्थान।
  2. भोजन सुविधा: धार्मिक कार्यक्रमों और दैनिक आगंतुकों के लिए भोजनालय और भंडारे की परंपरा।
  3. धर्मशाला: बड़े सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के लिए विशाल धर्मशाला की व्यवस्था।
  4. समारोह स्थल: समाज में होने वाले विवाह, संस्कार और बड़े आयोजनों के लिए उपयुक्त स्थान।
🌿 आगामी विकास योजनाएँ

मंदिर को और अधिक सुव्यवस्थित एवं सुविधायुक्त बनाने के लिए ट्रस्ट द्वारा कई योजनाएँ बनाई गई हैं:

  • सर्व-सुविधायुक्त अतिथिगृह और भोजनालय – ताकि बाहर से आने वाले भक्तों को उचित ठहरने और भोजन की सुविधा मिल सके।
  • सुंदर बगीचा – संध्या समय भक्त हरियाली युक्त वातावरण में विश्राम और ध्यान कर सकें।
  • भव्य हॉल का निर्माण – विवाह परिचय सम्मेलन, यज्ञोपवित संस्कार, षटचंडी यज्ञ, हवन और अन्य बड़े समारोहों को बिना किसी विघ्न के संपन्न कराने के लिए।
  • सड़क और प्रकाश व्यवस्था – मंदिर सड़क से लगभग 200 मीटर की दूरी पर है और रास्ता पथरीला होने से भक्तों को कठिनाई होती है। ट्रस्ट और नगरपालिका द्वारा इस मार्ग का डामरीकरण और उचित प्रकाश व्यवस्था शीघ्र कराई जाएगी।
🚧 मार्ग और प्रकाश व्यवस्था
  1. 1. मंदिर तक आने-जाने वाले मार्ग को विकसित करना प्राथमिकता में है।
  2. 2. डामरीकरण का कार्य जल्द शुरू होगा ताकि पैदल और वाहन से आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधा मिले।
  3. 3. रात्रि में सुरक्षित आवाजाही के लिए आधुनिक लाइटिंग सिस्टम लगाया जाएगा।
  4. 4. यह कार्य नगरपालिका और ट्रस्ट की देखरेख में समय पर पूरा किया जाएगा।

✨ मातंगी धाम – भविष्य की दृष्टि

मातंगी धाम आज पूरे समाज के लिए गर्व और आस्था का प्रतीक बन चुका है। यहाँ की नक्षत्र वाटिका, विशाल पांडाल, बालाजी हनुमान मंदिर, शिव मंदिर, तालाब और धर्मशाला श्रद्धालुओं को एक संपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव कराते हैं। ट्रस्ट का यह संकल्प है कि आने वाले वर्षों में इसे और विकसित कर झाबुआ नगर का प्रमुख तीर्थ स्थल बनाया जाए। हम सभी भक्तों और समाज के सहयोग से मातंगी धाम को न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाएँगे।

आरती ,स्तुति एवं चालीसा

मंदिर विषयक

माँ मातंगी धाम: झाबुआ

प्रकृति, शक्ति और आस्था का पावन संगम

about-matangi-temple-jhabua

माँ मातंगी धाम, मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में स्थित एक परम पावन और अलौकिक धार्मिक स्थल है। यह धाम आदिशक्ति की दस महाविद्याओं में से एक, देवी मातंगी को समर्पित है, जिन्हें सनातन धर्म में वाणी, प्रखर ज्ञान, संगीत, बुद्धि और संपूर्ण ललित कलाओं की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

यह सुरम्य धाम न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अद्भुत प्राकृतिक शांति का भी वासस्थल है। चारों ओर से घने और हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित यह परिसर ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् प्रकृति की गोद में मुस्कुरा रहा हो। मंदिर प्रांगण में कदम रखते ही भक्तों को एक अतींद्रिय शांति और प्राचीन तपोभूमि जैसी दिव्यता का अनुभव स्वतः होने लगता है।

इतिहास एवं पावन पटोत्सव

माँ मातंगी धाम एक नवनिर्मित स्थापत्य कला का उत्कृष्ट और भव्य उदाहरण है। इस पावन मंदिर की नींव और माँ मातंगी की दिव्य विग्रह (प्रतिमा) की प्राण-प्रतिष्ठा **फरवरी 2011** में संपन्न हुई थी। यह आयोजन एक भव्य चार दिवसीय महामहोत्सव के रूप में आयोजित किया गया था, जिसमें वेदोक्त मंत्रोच्चार के साथ माँ का प्रथम पटोत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया गया था। तब से लेकर आज तक प्रतिवर्ष फरवरी माह में यहाँ वार्षिक पटोत्सव एवं विशेष महाआरती का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ संपन्न होता है।

महाविद्या: कुलदेवी के रूप में मान्यता

देवी मातंगी तांत्रिक उपासनाओं और दस महाविद्याओं की प्रमुख शक्ति हैं, जिन्हें साक्षात् देवी पार्वती का ही एक स्वरूप माना जाता है। इसके साथ ही, माँ मातंगी **मोढ़ ब्राह्मण समुदाय की परम आराध्य कुलदेवी** हैं। माँ की आराधना करने से वाणी में मधुरता, संगीत और कला के क्षेत्र में सिद्धि तथा अज्ञान के अंधकार से मुक्ति प्राप्त होती है, यही कारण है कि कला और शिक्षा जगत से जुड़े लोग यहाँ विशेष रूप से शीश नवाने आते हैं।

सह-अस्तित्व: सिद्धपीठ बालाजी धाम

इस धाम की पवित्रता को यहाँ का प्रांगण और अधिक बढ़ा देता है, जिसे **सिद्धपीठ बालाजी धाम** कहा जाता है। वर्ष 1993 में जनसहयोग के पावन संकल्प से हनुमान जी के एक प्राचीन छोटे चबूतरे के स्थान पर सुंदर मंदिर का निर्माण हुआ था।

🔱 सिद्धत्व का रहस्य: इस परिसर में पिछले कई वर्षों से अनवरत रूप से प्रतिदिन रामायण पाठ तथा प्रत्येक शनिवार को सामूहिक सुंदरकांड का संगीतमय पाठ किया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, किसी भी स्थान पर लगातार 12 वर्षों तक नित्य पूजन और पाठ होने से वह भूमि जाग्रत और सिद्ध हो जाती है। इसी कारण यह क्षेत्र 'सिद्धपीठ' के रूप में विश्वविख्यात है।

प्रमुख उत्सव एवं आयोजन

धाम परिसर में वर्षभर धार्मिक अनुष्ठान चलते रहते हैं, जिनमें से मुख्य आकर्षण निम्नलिखित हैं:

नवरात्रि उत्सव

नौ दिनों तक विशेष घटस्थापना पूजन, अखंड ज्योति कलश और शतचंडी महायज्ञ।

छप्पन भोग

विशेष पर्वों पर माँ मातंगी और बालाजी सरकार को 56 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग।

हनुमान जन्मोत्सव

मारुति यज्ञ, महाभिषेक, भव्य सिंदूरी श्रृंगार और विशाल भंडारा आयोजन।

वार्षिक पाटोत्सव

फरवरी माह में स्थापना दिवस पर तीन दिवसीय विशेष अनुष्ठान व महाप्रसादी।

स्थान एवं सुगम मार्ग निर्देश (Connectivity)

यह पावन धाम भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत सुलभ मार्ग पर स्थित है, जिससे देश के किसी भी कोने से श्रद्धालु यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं:

📍 मुख्य अवस्थिति: झाबुआ शहर के मध्य भाग में, इंदौर-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-47) पर।

🚗 प्रमुख शहरों से दूरी: यह स्थल व्यावसायिक राजधानी इंदौर से लगभग 150 किलोमीटर और गुजरात के दाहोद शहर से मात्र 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

🚂 रेलवे मार्ग: रेल यात्रियों के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मेघनगर (MGN) है, जो यहाँ से केवल 15 किलोमीटर दूर है।

🚌 स्थानीय साधन: मेघनगर स्टेशन या झाबुआ बस स्टैंड पर उतरने के बाद, भक्तगण बिना किसी परेशानी के नियमित बसों, टैक्सियों, जीप या ऑटो के माध्यम से सीधे माँ मातंगी धाम पहुँच सकते हैं।

आसपास के प्रमुख कस्बे: धाम के समीप ही रानापुर, थांदला, जोबट और मेघनगर जैसे कई प्रमुख कस्बे व ग्राम स्थित हैं, जहाँ से नित्य सैकड़ों स्थानीय श्रद्धालु दर्शन लाभ हेतु धाम परिसर में आते हैं।

बालाजी धाम

|| सिद्धपीठ बालाजी धाम ||

कृषि विज्ञान केंद्र (कृषि फार्म) परिसर, झाबुआ

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पावन इतिहास व सिद्धत्व

मां मातंगी मंदिर प्रांगण के समीप ही यह अलौकिक सिद्धपीठ बालाजी धाम स्थित है। इतिहास के अनुसार, पूर्व में यहाँ घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर हनुमान जी का एक छोटा सा चबूतरा हुआ करता था। कृषि विभाग के धर्मपरायण कर्मचारियों ने यहाँ नित्य पूजन की शुरुआत की थी।

वर्ष 1993 में जनसहयोग के पावन संकल्प से यहाँ एक भव्य और सुंदर मंदिर आकार ले सका और प्रभु की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। शास्त्रों के अनुसार, जिस स्थान पर निरंतर 12 वर्षों तक बिना रुके नित्य पूजा-पाठ होता है, वह क्षेत्र सिद्ध हो जाता है। इसी कारण अनवरत रामायण व सुंदरकांड पाठ के प्रताप से इसे 'सिद्धपीठ' की संज्ञा मिली।

कृषि फार्म परिसर की विशेषताएँ

यह मंदिर झाबुआ के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) फार्म की पहाड़ी पर स्थित होने के कारण अत्यंत अनूठा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

प्राकृतिक वातावरण

चारों ओर कृषि फार्म की हरियाली, शांत और प्रदूषण मुक्त आध्यात्मिक वातावरण।

पहाड़ी सौंदर्य

ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ से प्रकृति का बेहद मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

कृषि-भक्ति संगम

कृषि वैज्ञानिकों, कर्मचारियों और कृषकों की अटूट श्रद्धा का केंद्र।

पवित्र परिसर

मातंगी माता मंदिर और बालाजी धाम का एक ही प्रांगण में होना इसकी दिव्यता बढ़ाता है।

श्री हनुमान जन्मोत्सव (जयंती) धूम

सिद्धपीठ बालाजी धाम पर प्रतिवर्ष श्री हनुमान जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भव्य पैमाने पर मनाया जाता है, जिसमें संपूर्ण झाबुआ अंचल से हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु उमड़ते हैं:

🚩 महाभिषेक व श्रृंगार: जन्मोत्सव के पावन अवसर पर तड़के प्रभु बालाजी का सिंदूर, अष्टगंध और दिव्य चोलों से अलौकिक श्रृंगार किया जाता है।
अखंड रामायण पाठ की पूर्णाहुति के साथ ही विशाल मारुति यज्ञ (हवन) का आयोजन होता है।
शाम को महाआरती के पश्चात समस्त भक्तों के लिए विशाल भंडारे (महाप्रसादी) का आयोजन कृषि फार्म प्रांगण में किया जाता है, जो देर रात तक चलता है।

सेवा एवं सूत्रधार

पूर्व सेवादार: कृषि विभाग के निष्ठावान कर्मचारी श्री शिवनारायण पुरोहित ने पिछले 16 से अधिक वर्षों तक अकेले इस मंदिर की देखरेख और पूजन व्यवस्था का जिम्मा पूरी निष्ठा से संभाला।

वर्तमान सेवादार: श्री पुरोहित जी की सेवानिवृत्ति के पश्चात अब सर्वसम्मति से यह पावन उत्तरदायित्व श्री राकेश त्रिवेदी को सौंपा गया है, जो पूरी श्रद्धा और तत्परता से मंदिर की व्यवस्थाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।

 
मातंगी पारमार्थिक ट्रस्ट
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