या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थित । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्tस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमःया देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभुतेषु बुद्धि रूपेण थिथिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी rूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमःया देवी सर्वभूतेषू क्षान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
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महाविद्या मातंगी देवी साधना

🔱 नौवीं महाविद्या: भगवती राजमातंगी महागाथा 🔱

इस अनंत ब्रह्मांड को संचालित करने वाली आद्याशक्ति के दस परम दिव्य स्वरूप 'दस महाविद्या' के नाम से पूजनीय हैं। इसी पावन श्रृंखला के नौवें क्रम में आदिस्वरूपिणी भगवती मातंगी साक्षात प्रकट होती हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, देवाधिदेव भगवान शिव के 'मतंग' स्वरूप की शक्ति और सहचरी होने के कारण संपूर्ण लोकों में इन्हें 'माँ मातंगी' के नाम से सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ।

मातंगी देवी इतिहास- matangi maa history- matangi mata history in hindi-

✨ साधना का परम सौभाग्य और पूर्णता

मानव जीवन में महामातंगी की दीक्षा या साधना का सुअवसर प्राप्त होना ही ईश्वरीय कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस साधना की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए परम तपस्वी महर्षि विश्वामित्र ने स्पष्ट किया है कि माँ मातंगी की आराधना करने पर बाकी नौ महाविद्याओं की शक्तियां साधक को स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। यदि कोई साधक अन्य नौ शक्तियों की उपासना न भी कर सके, और केवल एकाग्रचित्त होकर मातंगी साधना को सिद्ध कर ले, तो उसका जीवन हर दृष्टिकोण से परिपूर्ण हो जाता है।

“मातंगी मेवत्वं पूर्ण, मातंगी पूर्णत्व उच्चते”

अर्थात: मातंगी ही सर्वोपरि श्रेष्ठ साधना है और केवल माँ मातंगी की शरण में ही पूर्णत्व संभव है।

👑 ऐतिहासिक एवं तांत्रिक पृष्ठभूमि

यूं तो माँ मातंगी जीवन के सूक्ष्म और स्थूल दोनों ही पक्षों को संवारती हैं, परंतु कलयुग में साधकों के बीच यह साधना विशेष रूप से तीव्र भौतिक उन्नति और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सर्वप्रिय रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिभुवन स्वामी भगवान विष्णु ने सर्वसुख, अकूत संपदा और चिरस्थायी उच्च पद की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम माँ मातंगी की ही आराधना की थी।

इस दिव्य शक्ति की महिमा इतनी व्यापक है कि बौद्ध परंपराओं में भी इन्हें "मातागिरी" नाम से बेहद आदरणीय माना गया है। गुप्त तंत्र विज्ञान के अनुसार, भगवती मातंगी साक्षात वाग्देवी सरस्वती का ही प्रखर रूप हैं, जो त्रिपुरसुन्दरी के ब्रह्मांडीय रथ की मुख्य सारथी और प्रधान सलाहकार की भूमिका निभाती हैं।

🎯 समाज में सम्मान और 'बहुमत' का रहस्य

हम जीवनभर कड़ा परिश्रम करते हैं, परिवार और समाज को खुश रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं, फिर भी कई बार हमें वह आदर-सत्कार नहीं मिलता जिसके हम हकदार होते हैं। इसका मूल कारण जीवन में 'बहुमत' यानी प्रखर लोकप्रियता और आकर्षण का अभाव है। जब तक समाज आपकी योग्यता को स्वीकार करके आपके सामने नतमस्तक नहीं होता, तब तक अपनों के बीच भी केवल उपेक्षा ही मिलती है। लेकिन जैसे ही माँ मातंगी की कृपा से आपके व्यक्तित्व में तेज और प्रसिद्धि का संचार होता है, धन की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी स्वयं आपके द्वार पर आने को विवश हो जाती हैं।

💎 महामातंगी साधना के ३ चमत्कारी एवं अचूक लाभ:
  • अभूतपूर्व कीर्ति और यश: इस साधना की पूर्णता के बाद साधक जिस भी कार्यक्षेत्र या समाज में कदम रखता है, वहां उसे अद्वितीय ख्याति प्राप्त होती है। उसका व्यक्तित्व अत्यंत चुंबकीय, लोकप्रिय और यशस्वी बन जाता है।
  • अखंड गृहस्थ सुख और कुल-प्रतिष्ठा: चूंकि यह साधना सीधे तौर पर सौभाग्य से जुड़ी है, इसलिए साधक को सुखी दांपत्य जीवन, योग्य संतान, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। परिवार में उसका मान-सम्मान और प्रभुत्व कई गुना बढ़ जाता है।
  • अकूत धन-संपदा एवं राजसी सुख: माँ मातंगी के भीतर साक्षात महालक्ष्मी का वास है। फलतः साधक की दरिद्रता का समूल नाश होता है। निरंतर आय के स्रोत, भव्य भवन, उत्तम वाहन सुख, समाज में उच्च पद-प्रतिष्ठा और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति पलभर में हो जाती है।
विशेष परामर्श: एक प्रबुद्ध साधक के रूप में आप जानते हैं कि तंत्र साधना केवल भौतिक लाभ तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह मनुष्य का सर्वांगीण और आध्यात्मिक कायाकल्प करती है। इस परम कल्याणकारी साधना सत्र में पूर्ण धैर्य, अटूट निष्ठा और गुरु-विश्वास के साथ प्रवेश करें और अपने जीवन को प्रगति के शिखर पर ले जाएं।
🔱 महाविद्या राजमातंगी: रहस्य, लाभ एवं शक्तिपीठ 🔱
१. महामाया मातंगी देवी का प्राकट्य रहस्य

सनातन तंत्र ग्रंथों के अनुसार, महाविद्या मातंगी देवी दसमहाविद्या साम्राज्य के नौवें गौरवशाली सिंहासन पर अधिष्ठित हैं। वे पराशक्तियों के उस सर्वोच्च शिखर का प्रतिनिधित्व करती हैं जो साधक को अद्वितीय बुद्धिमत्ता, दिव्य कलात्मक कौशल और अचूक वाक्-सिद्धि (वाणी की शक्ति) प्रदान करने में पूरी तरह समर्थ हैं।

1.1 आदिस्वरूपा मातंगी का दिव्य विग्रह
अंग का वर्ण: मरकत मणि सदृश दिव्य हरित (हरा)
🦚 दिव्य वाहन: प्रफुल्लित कलापों वाला मयूर (मोर)
⚔️ हस्त आयुध: रत्नजटित वीणा, प्रखर खड्ग और पाश
🔱 तंत्रोक्त रूप: उच्छिष्टचाण्डालिनी (परम पावन अघोर विग्रह)
“हरितांगी मातंगी देवी वीणापुस्तकधारिणी।
सर्वसिद्धिप्रदात्री च सर्वकामफलप्रदा॥”
२. महामातंगी साधना के ७ अलौकिक महा-लाभ
🗣️ वाक् सिद्धि व सम्मोहन
देवी की अनुकंपा से साधक की वाणी में एक अमिट सम्मोहन शक्ति और अद्वितीय मिठास उत्पन्न होती है, जिससे जनमानस प्रभावित होता है।
👑 राजयोग और नेतृत्व
उच्च प्रशासनिक स्तरों पर अधिकार, नेतृत्व क्षमता का अप्रत्याशित विकास और समाज में प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
🎵 कला-सिद्धि में निपुणता
संगीत, अभिनय, काव्य, लेखन और समस्त ललित कलाओं के गुप्त आयामों में साधक को असाधारण महारत मिलती है।
💰 समृद्धि एवं महालक्ष्मी कृपा
रुका हुआ धन वापस मिलता है, व्यापारिक बाधाएं स्वतः नष्ट होती हैं और आकस्मिक धन संपदा का मार्ग खुलता है।
⚔️ शत्रु पराभव व विजय
जीवन के किसी भी विवाद, अदालती मामलों, या घोर प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में साधक सदैव विजयी बनकर उभरता है।
🎯 मनोवांछित कामना पूर्ति
हृदय में छिपी समस्त भौतिक इच्छाएं और मनोरथ माँ मातंगी के दिव्य आशीर्वाद से बहुत ही सहजता से पूर्ण हो जाते हैं।
🔮 गूढ़ तांत्रिक विद्याओं का उदय
मंत्र विज्ञान, यंत्र निर्माण और गुप्त तांत्रिक विधाओं की रहस्यमयी अनुभूतियों का ज्ञान साधक के अंतःकरण में स्वयं जागृत होने लगता है।
३. भूलोक पर अवस्थित महाविद्या मातंगी के ४ प्रमुख जाग्रत पीठ
  • महापीठ कामाख्या (असम): ५१ सिद्ध शक्तिपीठों के पावन परिसर में माँ का यह रूप तंत्र साधना का केंद्र है।
  • मातंगी शक्तिपीठ, उज्जैन (म.प्र.): राजा विक्रमादित्य की तपोभूमि पर बाबा कालभैरव मंदिर के समीप स्थित एक परम जाग्रत स्थान।
  • तारापीठ (पश्चिम बंगाल): तंत्र और अघोर विधा के साधकों की महा-साधना स्थली, जहाँ देवी का यह स्वरूप अति उग्र और फलदायी है।
  • हिंगलाज महाशक्तिपीठ (पाकिस्तान): दुर्गम गुफाओं के मध्य स्थित प्राचीन और चमत्कारी सिद्ध शक्तिपीठ, जहाँ माँ की गुप्त ऊर्जा व्याप्त है।
⚠️ साधना के दौरान रखी जाने वाली अनिवार्य सावधानियां
  • यह एक उच्च स्तरीय महाविद्या साधना है, अतः इसे अनिवार्य रूप से केवल किसी सिद्ध और योग्य गुरु के दिव्य मार्गदर्शन में ही संपन्न करें।
  • साधना में उपयोग होने वाले सभी यंत्र, माला और गुटिका पूरी तरह से प्राण-प्रतिष्ठित और सिद्ध चैतन्य युक्त होने चाहिए।
  • साधना की तय समय सीमा (जैसे ११ या २१ दिन) के नियमों का अटूट निष्ठा के साथ नियमित पालन करें, बीच में खंडित न करें।
  • साधना काल में आने वाले अनुभवों को पूरी तरह गुप्त रखें और पग-पग पर गुरुदेव की आज्ञा व मर्यादा का अक्षरशः पालन करें।
🔱 माँ महामातंगी साधना विधि एवं कवच 🔱
🚩 साधना विधि
यह साधना गुप्त नवरात्रि अक्षय तृतीया या मातंगी जयन्ती अथवा मातंगी सिद्धि दिवस से आरम्भ की जा सकती है। इसके अतिरिक्त यह साधना किसी भी नवरात्रि के प्रथम दिन से अथवा किसी भी शुक्रवार से शुरू की जा सकती है। फिर भी अक्षय तृतीया से वैशाख पूर्णिमा के मध्य यह साधना सम्पन्न करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
यह साधना रात्रि 10 बजे के बाद शुरू करे या ब्रह्ममुहूर्त में भी की जा सकती है। आसन, वस्त्र सफ़ेद हो तथा आपका मुख उत्तर की ओर हो। सामने बजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाएं और उस पर अक्षत से बीज मन्त्र “ह्रीं” लिखें, फिर उस पर माँ मातंगी का कोई भी यन्त्र या चित्र स्थापित करे। यह सम्भव न हो तो एक मिटटी के दीपक में तिल का तेल डालकर कर जलाएं और उसे स्थापित कर दें। इस दीपक को ही माँ का स्वरूप मानकर पूजन करना है। अगर अपने यन्त्र या चित्र स्थापित किया है तो घी का दीपक पूजन में लगाना होगा, जो सम्पूर्ण साधना काल में जलता रहे।
सबसे पहले साधक को चाहिए कि वह समान्य गुरु पूजन करे और गुरुमन्त्र का चार माला जाप करे। फिर सद्गुरुदेवजी से महामातंगी साधना सम्पन्न करने के लिए मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।
तदुपरान्त भगवान गणपतिजी का संक्षिप्त पूजन करके “ॐ वक्रतुण्डाय हुम्” मन्त्र की एक माला जाप करें। फिर गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।
इसके बाद भगवान भैरवनाथजी का स्मरण करके “ॐ हूं भ्रं हूं मतंग भैरवाय नमः” मन्त्र की एक माला जाप करें और गुरुदेव तथा भगवान भैरवनाथ से साधना की निर्बाध पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।
तत्पश्चात साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। संकल्प में अपनी मनोकामना का उच्चारण करें और उसकी पूर्ति के लिए माँ भगवती मातंगी से साधना में सफलता तथा आशीर्वाद प्रदान करने की प्रार्थना करें।
इसके बाद साधक माँ भगवती मातंगी का सामान्य पूजन करे, भोग में सफ़ेद मिठाई अर्पित करे। साथ ही कोई भी इतर अर्पित करे। यदि अपने तेल का दीपक स्थापित किया है तो घी का दीपक लगाने की कोई जरुरत नहीं है। बाकी सारा क्रम वैसा ही रहेगा।
पूजन के बाद माँ भगवती मातंगी से अपनी मनोकामना कहे एवं सफलता तथा आशीर्वाद प्रदान करने की प्रार्थना करे। इसके बाद विनियोग मन्त्र न्यास आड़े के बाद स्फटिक माला से निम्न मन्त्र की 21 माला करें।
📿 विनियोग:
अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि विराट् छन्दः मातंगी देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्लीं कीलकं सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ।
✨ ऋष्यादिन्यास :
ॐ दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि। (सिर को स्पर्श करें)
विराट् छन्दसे नमः मुखे। (मुख को स्पर्श करें)
मातंगी देवतायै नमः हृदि। (हृदय को स्पर्श करें)
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये। (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)
हूं शक्तये नमः पादयोः। (पैरों को स्पर्श करें)
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ। (नाभि को स्पर्श करें)
विनियोगाय नमः सर्वांगे। (सभी अंगों को स्पर्श करें)
👐 करन्यास
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)
❤️ हृदयादिन्यास
ॐ ह्रां हृदयाय नमः। (हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ ह्रूं शिखायै वषट्। (शिखा को स्पर्श करें)
ॐ ह्रैं कवचाय हूं। (भुजाओं को स्पर्श करें)
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। (नेत्रों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रः अस्त्राय फट्। (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं)
👁️ ध्यानः
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्‌गीं।
न्यस्तैकाङ्‌घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्र
मातङ्‌गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥
मैं मातंगी देवी का ध्यान करता हूँ । वे रत्नमयी सिंहासनपर बैठकर पढ़ते हुए तोते का मधुर शब्द सुन रही हैं । उनके शरीर का वर्ण श्याम है । वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं तथा कह्लार – पुष्पों की माला धारण किये वीणा बजाती हैं । उनके अंग में कसी हुई चोली शोभा पा रही है । वे लाला रंग की साड़ी पहने हाथ में शंखमय पात्र लिये हुए हैं । उनके वदन पर मधु का हलका – हलका प्रभाव जान पड़ता है और ललाट में बिंदी शोभा दे रही है।
📿 मन्त्र :
।। ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महामातंगी प्रचितीदायिनी लक्ष्मीदायिनी नमो नमः ।।
मन्त्र जाप के उपरान्त एक आचमनी जल छोड़कर समस्त जाप माँ भगवती मातंगी को ही समर्पित कर दें। रोज की माला जाप हो जाने के बाद आप अपना जाप देवी मां मातंगी जी को समर्पित करे मंत्र दे रहा हूं वो बोलकर जाप समर्पित करे ।
🙏 जाप समर्पण मंत्र
गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री-त्वं
गृहाणास्मितकृतम् जपं।
सिद्धिर्भवतु मे देवी
त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ||
इस प्रकार यह साधना नित्य 11 दिनों तक सम्पन्न करें। साधना के अन्तिम दिन अग्नि प्रज्ज्वलित कर घी, तिल तथा अक्षत मिलकर 108 आहुति प्रदान करे। अगले दिन दीपक हो तो विसर्जन कर दे। यन्त्र या चित्र हो तो पूजाघर में रख दे। प्रसाद स्वयं ग्रहण कर ले। इतर सँभाल कर रख ले, प्रतिदिन इसे लगाने से आकर्षण पैदा होता है। इस तरह यह 11 दिवसीय साधना सम्पन्न होगी। कुछ दिनों में आप साधना का प्रभाव स्वयं अनुभव करने लगेंगे।
🛡️ श्री मातंगी कवचम् 🛡️
।। श्रीदेव्युवाच ।।
साधु-साधु महादेव, कथयस्व सुरेश्वर
मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।।
अर्थ: श्री-देवी ने कहा – हे महादेव ! हे सुरेश्वर ! मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रद दिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए ।
।। श्री ईश्‍वर उवाच ।।
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि, मातंगी-कवचं शुभं।
गोपनीयं महा-देवि, मौनी जापं समाचरेत् ।।
अर्थ: ईश्वर ने कहा – हे देवि उत्तम मातंगी-कवच कहता हूँ, सुनो । हे महा-देवि इस कवच को गुप्त रखना, मौनी होकर जप करना ।
📋 विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीमातंगी-कवचस्य श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषिः । विराट् छन्दः । श्रीमातंगी देवता । चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगः ।
✨ ऋष्यादि-न्यासः-
श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषये नमः शिरसि ।
विराट् छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीमातंगी देवतायै नमः हृदि ।
चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
🔱 ।। मूल कवच-स्तोत्र ।। 🔱
ॐ शिरो मातंगिनी पातु, भुवनेशी तु चक्षुषी ।
तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ।। 1 ।।

पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा।
त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ।। 2 ।।

ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।
महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ।। 3 ।।

अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।
ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ।। 4 ।।

रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।
नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ।। 5 ।।

महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।
लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ।। 6 ।।

चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः।
स-विसर्ग महा-देवि हृदयं पातु सर्वदा ।। 7 ।।

नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।
उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ।। 8 ।।

उग्र-तारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।
भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ।। 9 ।।

जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका।
विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ।। 10 ।।

नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ।। 11 ।।

रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।
ऊर्घ्वं पातु महा-देवि देवानां हित-कारिणी ।। 12 ।।

पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।

प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ।।
मातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।
सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ।। 13 ।।
इसके बाद फल श्रुति करे।
📜 ।। फल-श्रुति ।।
इति ते कथितं देवि गुह्यात् गुह्य-तरं परमं।
त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ।। 1 ।।

यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।
परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ।। 2 ।।

गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि।
ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ।। 3 ।।

नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ये देवा सुर-सत्तमाः ।। 4 ।।

ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः।
तं दृष्ट्वा साधक देवि लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ।। 5 ।।

कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।
राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ।। 6 ।।

सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः।
इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ।। 7 ।।

अल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।
गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ।। 8 ।।

तस्मै मातंगिनी देवी, सर्व-सिद्धिं प्रयच्छति ।।
॥ इति नंद्यावर्ते उत्तराखंडे त्वरिता फलदायिनी महाविद्या मातंगी कवच संपूर्ण ॥
Maa Matangi Sadhana, Beej Mantra, and Kavach: Complete Guide

आरती माँ मातंगी देवी

🔱 आरती माँ मातंगी की 🔱

ओम जय मातंगी मा (२)
द्विजवर सुखकर सगी, धमांधुरा नदी
ओम जयो जयो मा मातंगी मा‌

विप्रमात तुं विष्णुशक्ति तुं द्विज्ज्न उध्धरती मा… (२)
दया द्रष्टि करी प्रीते (२) द्विकुल भय हरती… ओम

पंचावन पर स्वार, अष्टदश भुजधारी मा… (२)
आयुध चक्र गदादि (२) प्रभुमय बलधारी… ओम

निगम नीतिना वचन प्रमाणे, तुं मा धर्मतणी मा… (२)
धर्मारण्यनी देवी (२) धर्मधरा वरती… ओम

आर्यावर्तमां धर्म स्थापवा, अधर्मने पाप हरवा मा… (२)
सितापति श्री रामे (२) श्रेय सकल करवा… ओम

विष्णु विरंची शिवजी, तव अर्चन करता मा… (२)
धर्म विद्यात्री तुजने (२) स्थापी शुभ करता… ओम

शोभे सुंदर रूप, रत्न जडित पटथी मा… (२)
स्मित मुख कमले ज्योति (२) करूणा द्रष्टिथी… ओम

धर्मक्षेत्रनी अधिदेवी तुं मातंगी लक्ष्मी मा… (२)
हरि नीकटे नीत वसती (२) तुं साक्षात लक्ष्मी मा… (२)
हरिप्रिया तुं सत्य विभुति लक्ष्मीरूप धरा मा… (२)
तव पद गुर्जर पावन (२) दश दिश वसुंधरा… ओम

मोढेश्वरी तुं मोढ ज्ञातिनी काम दुधा माता मा… (२)
मोढवृक्षना शीशुनी (२) तुं सर्जक माता… ओम

त्रिगुणा तत्व मयी, चींतामणी फूलदा मा… (२)
धर्म क्षेत्र धर्मेश्वरी (२) धर्मधरा वरदा… ओम

यर्जु विधिथी पूजा, तुज विप्रो करता मा… (२)
साम रूचायो भणता (२) प्रसन्नता वरदा… ओम

आसुर विधि ने विप्र मा आरती जयकारी
पूजन थाल ने विधि (२) तुज पर वारी… ओम

मोढेश्वरीनी आरती जे कोई गाशे, मा जे भावे गाशे,‌
दु:ख दरिद्र पापहरता, जन्म सफल थाशे… ओम
🎵 ऑडियो आरती सुनिए (यहाँ क्लिक करके डाउनलोड करें)

मातंगी कवच / Matangi Kavach

🔱 मातंगी कवच / Matangi Kavach 🔱

।। श्री देव्युवाच ।।
साधु-साधु महादेव। कथयस्व सुरेश्वर।
मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ॥
अर्थ: श्री-देवी ने कहा – हे महादेव। हे सुरेश्वर। मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रद दिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए।
।। श्री ईश्वर उवाच ।।
श्रृणु देवि। प्रवक्ष्यामि, मातंगी-कवचं शुभं।
गोपनीयं महा-देवि। मौनी जापं समाचरेत् ॥
अर्थ: ईश्वर ने कहा – हे देवि। उत्तम मातंगी-कवच कहता हूँ, सुनो। हे महा-देवि। इस कवच को गुप्त रखना, मौनी होकर जप करना।
📋 विनियोग –
अस्य श्रीमातंगी-कवचस्य श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषिः । विराट् छन्दः । श्रीमातंगी देवता । चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगः ।
✨ ऋष्यादि-न्यास
• श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषये नमः शिरसि ।
• विराट् छन्दसे नमः मुखे ।
• श्रीमातंगी देवतायै नमः हृदि ।
• चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
🔱 मूल कवच-स्तोत्र
ॐ शिरो मातंगिनी पातु, भुवनेशी तु चक्षुषी ।
तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ॥

पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा ।
त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ॥

ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।
महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ॥

अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।
ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ॥

रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।
नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ॥

महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।
लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ॥

चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः ।
s-विसर्ग महा-देवि । हृदयं पातु सर्वदा ॥

नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।
उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ॥

उग्र-tारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।
भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ॥

जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका ।
विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ॥

नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ॥

रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।
ऊर्घ्वं पातु महा-देवि । देवानां हित-कारिणी ॥

पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।

प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ॥
maातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।
सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ॥
📝 कवच का पूर्ण अर्थ
मातंगिनी देवी मेरे मस्तक की रक्षा करे, भुवनेश्वरी दो नेत्रों की, तोतला देवी दो कर्णों की, त्रिपुरा देवी मेरे बदन-मण्डल की, महा-माया मेरे कण्ठ की, माहेश्वरी मेरे हृदय की, त्रिपुरा दोनों पार्श्वों की और कामेश्वरी मेरे गुह्य-देश की रक्षा करे। चण्डी दोनों ऊरु की, रति-प्रिया जंघा की, महा-माया दोनों चरणों की और कुलेश्वरी मेरे सर्वांग की रक्षा करे। वैष्णवी सतत मेरे अंग-प्रत्यंग की रक्षा करे, मातंगी ब्रह्म-रन्घ्र में अवस्थान करके मेरी रक्षा करे। महा-पिशाचिनी बराबर मेरे ललाट की रक्षा करे, सुमुखी चक्षु की रक्षा करे, देवी नासिका की रक्षा करे।
महा-पिशाचिनी वदन के पश्चाद्-भाग की रक्षा करे, लज्जा मेरे दन्त की और सम्मार्जनी-हस्ता मेरे दो ओष्ठों की रक्षा करे। हे महा-देवि। तीन ‘ठं’ मेरे चिबुक और कण्ठ की और तीन ‘ठं’ सदा मेरे हृदय-देश की रक्षा करे। लीला माँ मेरे नाभि-देश की रक्षा करे, कालिका चक्षु की रक्षा करे, चामुण्डा जठर की रक्षा करे और कात्यायनी लिंग की रक्षा करे। उग्र-तारा मेरे गुह्य की, अम्बिका मेरे पद-द्वय की, शर्वाणी मेरे दोनों बाहुओं की और चण्ड-भूषण मेरे हृदय-देश की रक्षा करे।
मातृका रसना की रक्षा करे, पुष्टिका पूर्व-दिशा की तरफ, विजया दक्षिण-दिशा की तरफ और मेधा पश्चिम दिशा की तरफ मेरी रक्षा करे। श्रद्धा नैऋत्य-कोण की तरफ, लक्ष्मणा वायु-कोण की तरफ, शुभ-कारिणी मातंगी देवी ईशान-कोण की तरफ, सुवेशा अग्नि-कोण की तरफ, बाला उत्तर दिक् की तरफ और देव-वृन्द की हित-कारिणी महा-देवी ऊर्ध्व-दिक् की तरफ रक्षा करे। विश्व-रुपिणि वशिनी सर्वदा पाताल में मेरी रक्षा करे। “ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंगिन्यै फट् स्वाहा” – यह सार्द्धेकादश-वर्ण-मन्त्रमयी मातंगी सतत सकल स्थानों में मेरी रक्षा करे।
📜 फल-श्रुति
इति ते कथितं देवि । गुह्यात् गुह्य-तरं परमं ।
त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ॥

यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।
परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥

गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि ।
ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥

नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ye देवा सुर-सत्तमाः ॥

ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः ।
तं दृष्ट्वा साधक देवि । लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ॥

कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।
राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ॥

सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः ।
इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ॥
अल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।

गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ॥
हे देवि। तुमसे मैंने यह “त्रैलोक्य-मोहन” नाम का अति गुह्य देव दुर्लभ कवच कहा है। जो नित्य इसका पाठ करता है, वह सम्पत्ति का आधार होता है और अतुल परमैश्वर्य प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। यथा-विधि गुरु-पूजा करके उक्त कवच का पाठ करने से ऐश्वर्य, सु-कवित्व और वाक्-सिद्धि निश्चय ही प्राप्त की जा सकती है। मातंगी उसे नित्य नारी-संग दिलाती है। हे देवि। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, दूसरे प्रधान देव-वृन्द, ब्रह्म-राक्षस, वैताल, ग्रह आदि भूत-गण उस साधक को देखकर लज्जित होते हैं।
जो व्यक्ति इस कवच को धारण करता है, वह सर्व-सिद्धियाँ लाभ करता है। नृपति-गण उसका दासत्व करते हैं। वह षट्-कर्म साधन कर सकता है। अधिक क्या, वह सर्वत्र सिद्ध होता है। इस कवच को न जानकर, जो मातंगी की पूजा करता है, वह अल्पायु, धन-हीन और मूर्ख होता है। गुरु-भक्ति सर्वदा परमावश्यक है। इस कवच पर भी दृढ़ मति अर्थात् पूर्ण विश्वास रखना परम कर्तव्य है। फिर मातंगी देवी सर्व-सिद्धियाँ प्रदान करती है।

माँ मातंगी स्तोत्र || Matangi Stotra

🔱 श्री मातंगी स्तोत्रम् 🔱

मातङ्गीं मधुपानमत्तनयनां मातङ्ग सञ्चारिणीं‌
कुम्भीकुम्भविवृत्तपीवरकुचां कुम्भादिपात्राञ्चिताम् ।‌
ध्यायेऽहं मधुमारणैकसहजां ध्यातुस्सुपुत्रप्रदां‌
शर्वाणीं सुरसिद्धसाध्यवनिता संसेविता पादुकाम् ॥ १॥‌

मातङ्गी महिषादिराक्षसकृतध्वान्तैकदीपो मणिः‌
मन्वादिस्तुत मन्त्रराजविलसत्सद्भक्त चिन्तामणिः ।‌
श्रीमत्कौलिकदानहास्यरचना चातुर्य राकामणिः‌
देवित्वं हृदये वसाद्यमहिमे मद्भाग्य रक्षामणिः ॥ २॥‌

जयदेवि विशालाक्षि जय सर्वेश्वरि जय ।‌
जयाञ्जनगिरिप्रख्ये महादेव प्रियङ्करि ॥ ३॥‌

महाविश्वेश दयिते जय ब्रह्मादि पूजिते ।‌
पुष्पाञ्जलिं प्रदास्यामि गृहाण कुलनायिके ॥ ४॥‌

जयमातर्महाकृष्णे जय नीलोत्पलप्रभे ।‌
मनोहारि नमस्तेऽस्तु नमस्तुभ्यं वशङ्करि ॥ ५॥‌

जय सौभाग्यदे नॄणां लोकमोहिनि ते नमः ।‌
सर्वैश्वर्यप्रदे पुंसां सर्वविद्याप्रदे नमः ॥ ६॥‌

सर्वापदां नाशकरीं सर्वदारिद्रयनाशिनीम् ।‌
नमो मातङ्गतनये नमश्चाण्डालि कामदे ॥ ७॥‌

नीलाम्बरे नमस्तुभ्यं नीलालकसमन्विते ।‌
नमस्तुभ्यं महावाणि महालक्ष्मि नमोस्तुते ॥ ८॥‌

महाmaातङ्गि पादाब्जं तव नित्यं नमाम्यहम् ।‌
एतदुक्तं महादेव्या मातङ्गयाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ ९॥‌

सर्वकामप्रदं नित्यं यः पठेन्मानवोत्तमः ।
विमुक्तस्सकलैः पापैः समग्रं पुण्यमश्नुते ॥ १०॥‌

राजानो दासतां यान्ति नार्यो दासीत्वमाप्नुयुः ।‌
दासीभूतं जगत्सर्वं शीघ्रं तस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ ११॥

महाकवीभवेद्वाग्भिः साक्षाद् वागीश्वरो भवेत् ।‌
अचलां श्रियमाप्नोति अणिमाद्यष्टकं लभेत् ॥ १२॥‌

लभेन्मनोरथान् सर्वान् त्रैलोक्ये नापि दुर्लभान् ।‌
अन्ते शिवत्वमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३॥‌

मातंगी मंदिर दिव्य नक्षत्र वाटिका- Nakshatra Vatika

दिव्य नक्षत्र वाटिका

आध्यात्मिक और वानस्पतिक वैभव का जीवंत लोक

nakshatra-vatika-logo

झाबुआ के पावन सिद्धपीठ बालाजी धाम परिसर में 22 हजार वर्ग फीट के विशाल भूभाग पर 4 मई 2017 को अलौकिक 'दिव्य नक्षत्र वाटिका' की स्थापना की गई थी। पूर्णतः आध्यात्मिक पद्धति से निर्मित यह देश की दूसरी सबसे बड़ी व विशिष्ट वाटिका मानी जाती है। यहाँ ब्रह्मांडीय ऊर्जा को संतुलित करने वाले ऐसे दुर्लभ पौधे सहेजे गए हैं, जो सीधे तौर पर विभिन्न ग्रहों व नक्षत्रों के पूजन अनुष्ठानों में उपयोग किए जाते हैं।

वर्तमान में इस अनुपम वाटिका को वैश्विक स्तर का सौंदर्य प्रदान करने के लिए सीधे **आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध नर्सरियों** से विशेष आकर्षक फूल और दुर्लभ पौधों की प्रजातियाँ मंगवाई जा रही हैं। यहाँ **27 नक्षत्र और 9 ग्रहों** का प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट रोपण के साथ-साथ चारों ओर दिव्य हरियाली का अनूठा ताना-बाना बुना गया है।

मातंगी मंदिर दिव्य नक्षत्र वाटिका- Nakshatra Vatika ✨ 200 फीट की ऊंचाई से नक्षत्र वाटिका का विहंगम व मनोहारी नज़ारा ✨
अंतर्राष्ट्रीय एवं दुर्लभ प्रजातियाँ

इस अलौकिक वाटिका में दो भिन्न देशों के गौरवशाली **राष्ट्रीय वृक्षों** का एक साथ मिलन देखने को मिलता है—जिसमें भारत का सनातन पूजनीय **वट वृक्ष** और श्रीलंका का राजसी **नाग केसर** शामिल हैं। इसके अलावा देश के सुदूर क्षेत्रों जैसे शिलांग से लाई गई विशेष 'बेत' नामक औषधि, जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों के चीड़, और झालावाड़, आगर, इंदौर, दिल्ली व खरगोन से लाई गई अनूठी पुष्पीय प्रजातियाँ यहाँ की हवाओं को सुवासित कर रही हैं।

🌸 भगवान तिरुपति का परम प्रिय 'सोन चम्पा'

समिति के मुख्य सूत्रधार विशाल त्रिवेदी व पंडित हिमांशु शुक्ल के अनुसार, दक्षिण भारत के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भगवान वेंकटेश बालाजी को जिस विशेष सोन चम्पा की सुगंधित माला अर्पित की जाती है, उस दिव्य वृक्ष को यहाँ विशेष यत्न से रोपा गया है, जो अब पूर्ण परिपक्व होकर महक रहा है।

आंध्र प्रदेश के फूलों से महकेगा प्रांगण

वर्तमान में वाटिका की भव्यता को चार चांद लगाने के लिए पाँच अलग-अलग दुर्लभ प्रजातियों के गुलाब (हैदराबादी, झालावाड़ के विशेष गुलाब, चमेली और मोगरा) विकसित किए गए हैं। विद्या की देवी माँ सरस्वती की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माने जाने वाले लेवेंडर, गूगल, देशी कपूर, सफेद शमी, और रजनीगंधा के कारण पूरी वाटिका में चौबीसों घंटे एक दिव्य आध्यात्मिक खुशबू छाई रहती है।

🌿 औषधि व नवग्रह वृक्ष

  • रक्त चंदन व रूद्राक्ष
  • सफेद खैर व शमी
  • देशी कपूर व सिंदूर
  • गूगल, कुचला व चीड़
  • पीपल, साल व बकुल
  • कदम्ब, अरीठा व सुपारी

🌸 दिव्य पुष्प प्रजातियाँ

  • राजसी सोनचम्पा
  • अखंड गज मोगरा
  • रातरानी व जूही
  • वसंत मालती व कुंद
  • एगजोरा व नट
  • 5 प्रकार के शाही गुलाब

💡 विशेषता: यहाँ स्थित 'गज मोगरा' की यह विलक्षण विशेषता है कि यह किसी खास मौसम में नहीं बल्कि पूरे वर्ष (12 महीने) अपनी कलियों से लदकर खिलता रहता है। इस संपूर्ण वाटिका की निस्वार्थ सेवा व रख-रखाव **50 समर्पित सदस्यों की समिति** द्वारा नित्य किया जाता है।

🎯 वाटिका का मुख्य उद्देश्य:
भारत की समृद्ध सांस्कृतिक व वानस्पतिक विरासत को पुनर्जीवित करना तथा झाबुआ अंचल में एक ऐसा आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र विकसित करना है, जो सनातन संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक पर्यटन को एक सूत्र में पिरो सके।

मातंगी देवी इतिहास- मोढ़ेश्वरी माता मंदिर

माँ मातंगी देवी (मोढ़ेश्वरी माता) का विस्तृत इतिहास और पौराणिक महत्व

🔱 महाविद्या प्राकट्य एवं स्वरूप
मातंगी देवी इतिहास- matangi maa history- matangi mata history in hindi-

भारत की दिव्य शक्ति त्रिकोण में — महाविद्या त्रिपुरा सुंदरी, मातंगी और कामला का विशेष स्थान है। इनमें माँ मातंगी देवी दस महाविद्याओं में से एक हैं। उन्हें तांत्रिक स्वरूप की सरस्वती भी कहा जाता है। माँ मातंगी ज्ञान, वाणी, संगीत, कला और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। श्री मातंगी देवी अर्थात राजमाता दस महाविद्याओ की एक देवी है। मोड़ ब्राह्मन की कुल देवी है । मोहकपुर की मुख्या अधिष्टाता है देवी मातंगी की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है।

जिस प्रकार त्रेता युग में सत्य मंदिर, द्वापर युग में वेद्भुवन, कलयुग में मोहेसपुर जग प्रसिद्ध ही उसी प्रकार मध्य कल में मोढेरा के रुप में मातंगी का यह स्थान जग प्रसिद्ध हुआ । श्री ब्रह्मा जी ने स्वयं के मुख से श्री माता को प्रकट किया है। मोहकपुर में बसे हुए ब्राह्मणों की रक्षा हेतु श्री माता की स्थापना की गयी। श्री माता के हाथो में पुस्तक, कमंडल होती है, वस्त्र श्वेत अर्थात सफ़ेद होते है ये महालक्ष्मी और रुद्राणी भी कहलाती है।

✨ मातंगी स्वरूप का तांत्रिक एवं तात्विक विवेचन

तंत्र शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी दस महाविद्याओं में नवम (9वीं) स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। इन्हें 'राज-मातंगी', 'मंत्रिणी देवी' और 'श्यामला देवी' के नाम से भी पुकारा जाता है। देवी का यह अलौकिक स्वरूप ब्रह्मांड की ६४ कलाओं (64 Arts) का स्वामी है। जहाँ माता सरस्वती केवल बाहरी ज्ञान और विद्या की देवी हैं, वहीं माँ मातंगी अंतर्मन की गहरी समझ, गुप्त शक्तियों, वाक्-सिद्धि (Vaksiddhi) और ब्रह्मांडीय नाद की अधिष्ठात्री हैं। बुद्ध ग्रह की अधिष्ठात्री होने के कारण वे तीक्ष्ण बुद्धि और आकर्षण शक्ति (Vashikaran Shakti) प्रदान करती हैं।

॥ महाकवि कालिदास कृत श्यामल दंडकम ध्यानम् ॥
माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलापाम् ।
मातङ्गतनूजां शशिशेखराधारां स्मरामि सर्वेश्वरवामभागम् ॥

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती ने एक बार चांडाल (उच्छिष्ट) रूप धारण कर परस्पर लीला की थी, तब देवी का यह स्वरूप प्रकट हुआ था। इसी कारण इन्हें 'उच्छिष्ट चंडालिनी' भी कहा जाता है। वे सामाजिक बंधनों से परे, वन और प्रकृति की अनंत ऊर्जा में वास करती हैं।

⚔️ कर्नाट राक्षस का आतंक और मोढ़ेश्वरी अवतार

श्री माता की रक्षा कवच में वास करते करते ब्राह्मणों को सेकड़ो वर्ष बीत गए। तभी वहा कर्नाट नाम का एक राक्षस हुआ। यह राक्षस ब्राह्मणों को खूब परेशान करता और यज्ञ , पूजा विधान आदि में भारी विघ्न उत्पन्न करने लगा थक हार के सभी ब्राह्मन इस पीड़ा से मुक्ति हेतु श्री माता के पास पहुचे श्री माता ने सभी ब्राह्मणों को आशीर्वाद प्रदान कर राक्षसों का नाश करने का वचन दिया।

तत्पश्चात राक्षसों का वध हेतु श्री माता ने विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया श्री माता का यही रूप मातंगी मोढेशवरी के रूप में अवतरित हुआ। मातंगी लाल रंग के वस्त्र धारण करती है , सिंह की सवारी करती है लाल होठ वाली व अत्यंत स्वरुपवादी होती है । मातंगी लाल पादुका, लाल माला, धारण करती है।

हातो में धनुषबाण , खेटक,खड़क, कुल्हाड़ी, गर्डर, परिंह, शंख , घाट, पाश, कतार, छत्र , त्रिशूल, मद्यपात्र, अक्षमाला, शक्ति तोमर, महा कुम्भ आदि अपने हाथो में धारण करती है। मातंगी माता कढ़े व बाजुबंध पहनती है । श्वान ( कुते ) को अपने साथ रखती है। श्री मातंगी इसी रूप में आज मोढेरा में मोदेश्वरी माता के रूप में साक्षात् विद्यमान है। माता मातंगी के ऐसे स्वरुप को देख कर्नाट राक्षस मोहवश हुआ , और उसने मातंगी के समक्ष अघटित मांग रखी परन्तु देवी ने तो उसे ललकार कर युद्ध शुरू किया और अंत में कर्नाट राक्षस का वध किया । इसी वध से प्रसन्न होकर विद्रो और वणिको ने माता मातंगी की स्तुति करी। मातंगी ने कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में मातंगी की स्तुति व पूजा करने की आज्ञा दी। विशेष रूप से माघ मास की कृष्ण तृतीया के दिन मातंगी की वटवृक्ष के नीचे पूजा करने का विशेष महत्व है। इस पूरी कथा के फल स्वरुप कहा जा सकता है। की :-

📝 इस पावन कथा के मुख्य निष्कर्ष एवं विधान
  • 1. मोड़ ब्राह्मणों के इष्टदेव श्री राम है और उन्होंने ही हनुमान जी को मोड़ समाज की रक्षा हेतु मातंगी के निवास स्थल मोढेरा पर संरक्षक के रूप में नियुक्त किया है। 
  • 2. मोड़ समाज की कुलदेवी मातंगी देवी है जिन्होंने राक्षसों के विनाश के लिए विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया है। वो मातंगी मोदेश्वरी अठारह भुजा वाली है जिनका पूजन कुटुंब के सभी मांगलिक कार्यो में करना चाहिए । 
  • 3. चेत्री तथा अश्विनी दोनों ही नवरात्री में उपवास और मातंगी की पूजा करने का मोड़ ब्राह्मणों का विधान है । 
  • 4. मोड़ ब्राह्मन मूल रूप से गुजरात के निवासी है। 
🏹 प्रभु श्री राम का आगमन एवं सूर्य मंदिर इतिहास

श्री राम द्वारा रावन की ब्रह्म हत्या हुई जिसके प्रायाषित हेतु श्री राम ने कुल गुरु वशिष्ट से पूछा तब गुरु वशिष्ट ने उतर दिया की आप तो स्वयं भगवान के अवतार हो। परन्तु राम के अतिआग्रह के वश में होकर कुल गुरु वशिष्ट ने कहा की सभी विधि विधान मन की शुद्धी के लिए ही होते है परन्तु फिर भी पृथ्वी की ऊपर एक धर्मरान्य नाम का एक श्रेठ तीर्थ है। वहा यमराज , सूर्य पुत्र ( शनि) , सूर्य पत्नी ( संज्ञा ) ने भी तप किया है यही स्थल ब्रह्म हत्या की निवृति हेतु श्रेठ है। धर्मरान्य में प्रभु श्री राम पूरे परिवार के साथ प्रवेश कर रहे थे तभी उनके विमान, हाथी , घोडे आदि अचानक रुक गए। श्री राम ने गुरु वशिष्ट से कारण पूछा तो कुलगुरु वशिष्ट ने बताया की धर्मरान्य में पैदल चल कर जाना चाहिए यहाँ मातंगी का वास है। तब श्री राम ने सुवर्ण नदी के किनारे विशाल पढाव दिया और वहा अपने विमान, घोडे, हाथी आदि को रोका ।

नदी में स्नान विधि करी और पैदल चल कर मातंगी के दर्शन किये और देवी की अनुशंसा से धर्मरान्य का जीर्णोधार करने का संकल्प लिया । श्री राम त्रिमूर्ति अर्थात ब्रह्मा , विष्णु , महेश की आराधना करते है तीनो देवताओ ने वहा प्रकट होकर ब्राह्मणों को दान देने की बात कही । तभी तीनो देवो की उपस्थिति में ही धर्मरान्य का जीर्णोधार और भव्य प्रसाद का निर्माण कार्य शुरू किया। श्री राम ने ब्राह्मणों को ५५ गाँव दान में दिए । तत्पश्चात हनुमान जी वेश्य को लेकर आये एवं खेतो में खेती का कार्य आरम्भ किया । श्री राम ने धर्मरान्य के पुनरुधार के संस्मरण में मोड़ वणिको को एक खड़क और दो चम्मर भेट किये। उसी दिन से विवाह के समय वर अपने पास एक तलवार और दो चम्मर रखता है।

श्री राम ने अनेक मंदिरों का जीर्णोधार किया । बकुल के वृक्ष के नीचे जहा सूर्य पत्नी संज्ञा ने तप किया था वहा श्री राम ने बहुलार्क नाम का सूर्य का भव्य मंदिर बनाया। जहा पर श्री राम के हाथो ही कुलस्वामी सूर्य की मूर्ति की स्थापना की गयी। आज भी सूर्य मंदिर के अवशेष यथारूप में उपस्थित है और उनकी शिल्प और कलाकृति बेजोड़ और अत्यंत ही दुर्लभ है। इस सूर्य मंदिर को देख कर ये अनुमान लगाया जा सकता है की ये ११ वि शताब्दी में ही निर्मित हुआ होगा।

🛡️ ऐतिहासिक संघर्ष, विभाजन एवं मोढेरा का युद्ध

मोहेक्पुर में कन्या कुंज कन्नोज नाम के राजा का राज इस प्रदेश पर शुरू हुआ। वह राजा पराक्रमी था उसने वैष्णव धर्म को छोड़ बोद्ध धर्म को स्वीकार किया। बोद्ध गुरुओं की उपदेशो से वहा की प्रजा भी बोद्ध धर्म स्वीकार करने लगी। राजा ने अपनी पुत्री रत्न गंगा का विवाह वल्लभी राजा के साथ किया । उसने ब्राह्मणों के अधिकार छीन लिए ब्राह्मणों ने श्री राम चन्द्र जी के ताम्र पत्रों पर लिखे हुए दान पत्र भी बताये पर राजा नहीं माना । उसने कहा की तुम्हारे रक्षक हनुमान जी है उन्ही के पास से भूमि ले लेना। सभी ब्राह्मन धर्मरान्य वापस आये । चतुर दलीय करने वाले ब्राह्मन चतुर्विद, अर्थात चतुविधि के नाम से जाने जाते है। चतुविधि ब्रह्म समाज के १५ हज़ार में से २० तथा ३ हज़ार त्रेवाधेया के ११ इस प्रकार कुल ३१ ब्राह्मन रामेश्वर पहुचे ।

चतुर्वेदी ब्राह्मन वापस आ गए और बाकी के त्रेवैद्य ब्राह्मन अनेक संकट सहते हुए रामेश्वर पहुचे। विद्रोहियों के आक्रमण से प्राचीन पूरण प्रसिद्ध मोढेरा नगरी खंडरो में तब्दील हो गयी। प्रजा और बस्ती अलग अलग दिशा में बिखर गयी इनमे जो अदालाज़ गाँव में गए वो अद्लाजा कहलाये जो मांडल गाँव में गए वो मान्दलिये कहलाये । इस प्रकार अदालजा व मंडलीय दोनों ही जगह निवासरत लोग मुख्यतः तो वणिक ही थे । खेती करने वाले लोग पटेल की जाती से जाने गए तेल का काम करने वाले लोग चंपा नेरी मोड़ और नाव चलाने वाले लोग मधुकर मोड़ जाती के नाम से जाने गए।

समय गुजरता गया और गुजरात के राजपूत राजा करण देव वाघेला, दिलली के अल्लोउद्दीन खिलजी , अलफ खान सेनापति के हाथो यह राजा परस्त हुआ संवत १३५६ में गुजरात में मुस्लिम राज सत्ता आई और गुजरात के मंदिर टूटने लगे मोढेरा के मोड़ ब्राह्मन केवल वेद पाठ करने वाले ही नहीं थे वे तो विपरीत परिस्थितियों में स्वयं और परिवार की रक्षा हेतु भी वचन बध थे। मोड़ ब्राह्मणों में जयेष्ट मल्ल ब्राह्मन तो वज्र मुष्टि पहलवान थे और सेना में भी मुख्य थे। सम्पूर्ण मोढेरा गाँव ने मुस्लिन सेना का डट कर सामना किया ।

मंदाव्य गोत्र के पराक्रमी ब्राह्मन सुभट विठलेश्वर मोड़ ने मोड़ ब्राह्मणों की सेना संगठित की और ६ माह में शत्रुओ को थका दिया। तत्पश्चात दोनों ही सेना में सुलह हुई और फेसला हुआ की ब्राह्मन मुस्लिमो को पांच हज़ार सोने की मोहर दे तो मुस्लिम अपने घर हटाकर जमीन खाली करने को तैयार है। इस प्रकार सुलह होने पर मोढेरा गाँव के दरवाजे खोल दिए गए। आखिर में मोड़ ब्राह्मणों के साथ धोखा हुआ मुस्लिम सेनिको ने मोढेरा को लुट लिया , सूर्य मंदिर को तोड़ दिया , और मातंगी माता की मूर्ति को खंडित करने हेतु आ ही रहे थी इस भय से ब्राह्मणों ने मातंगी मूर्ति को जमीं में गहरी सुरंग ( वाव ) कर मातंगी मूर्ति को लोहे की चैन से बांधकर उसमे समाहित कर दिया । मातंगी मूर्ति को समाहित करने वाली यह वाव ही धर्मवाव के रूप में प्रसिद्ध हुई जो आज भी मोढेरा में यथावत है। जिस दिन मातंगी मूर्ति सुरंग में भेजी गयी उस दिन धुलेटी का दिन था।

🚂 गायकवाड़ शासन, अडिग संकल्प एवं प्राण प्रतिष्ठा

गुजरात में गायकवाड सरकार की सत्ता में धार्मिक स्थलों की अवनति रुक गयी तथा इस समय मोड़ ब्राह्मन मोढेरा, मालवा, उज्जैन, इंदौर, भोपाल आदि शेहरो में बसने लगे । सयाजी राव गायकवाड ने रेलवे लाइन को मोढेरा तक बनवाया जिससे भक्त आसानी से मातंगी धाम तक पहुच सके । इसी बीच नाथुलाल गिरधारी लाल पारीख ने यह संकल्प लिया की जब तक मातंगी मंदिर का जीर्णोधार नहीं होता तब तक वे सर पर पगड़ी और पैर में मोजडी धारण नहीं करेंगे । ब्रिटिश राज्य में बड़ोदरा शहर की कायाकल्प हेतु लाटरी निकली गयी एवं चंदा एकत्रित किया गे। संवत १८६२ में जीर्णोधार प्रारंभ किया गया विक्रम संवत १८६६ महा सूद की १३ वे दिन अर्थात तेरस के दिन मातंगी माता की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का दिन आया । दो समर्थ विद्वान् जामनगर निवासी शास्त्री जी हाथी भाई हरी शंकर और अहमदावाद निवासी शास्त्रीजी रामकृष्ण हर्ष जी के हाथो विधि विधान से मातंगी की प्राण प्रतिष्ठा गयी इसी दिवस को महसूद १३ दिवस अर्थात तेरस के दिन मातंगी का पाटोत्सव आयोजित किया जाता है। 

🔮 मातंगी साधना एवं आराधना का महाफल

शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी की साधना से साधक को अष्टऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गृहस्थ जीवन में आ रहे क्लेश, दरिद्रता और शत्रुओं के दमन के लिए मातंगी पूजा अचूक मानी जाती है। जो भक्त मोढ़ेश्वरी माता के इस प्राकट्य स्थल (मोढेरा) का श्रद्धापूर्वक ध्यान करते हैं, माँ उनकी वाणी में ओज और जीवन में राजसी वैभव प्रदान करती हैं।

🔱 मातंगी बीज मंत्र (Matangi Beej Mantra) 🔱
"ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा"
📝 मंत्र का अर्थ
यह मंत्र बीज अक्षरों और समर्पण का एक शक्तिशाली संयोजन है:
  • ॐ: ब्रह्मांड का प्रतीक।
  • ह्रीं: माया और शक्ति का बीज मंत्र।
  • क्लीं: आकर्षण और प्रेम का बीज।
  • हूं: सुरक्षा और चेतना जागृत करने का बीज।
  • मातंग्यै फट् स्वाहा: मातंगी देवी को आहुति और पूर्ण समर्पण।
✨ अन्य सरल बीज मंत्र
यदि आप विस्तृत मंत्र का जाप नहीं कर पा रहे हैं, तो इन सरल मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं:
ॐ ह्रीं मातंग्यै नमः
ॐ ह्रीं ऐं मातंग्यै नमः
🔱 साधना और जाप के लाभ
  • वाक्-सिद्धि: जो साधक सच्चे मन से इनका जाप करते हैं, उन्हें वाणी में अद्भुत शक्ति मिलती है और उनके मुख से निकले शब्द सत्य हो जाते हैं।
  • ज्ञान और बुद्धि: शिक्षा, कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए यह साधना अत्यंत लाभकारी है।
  • आकर्षण और प्रभाव: यह मंत्र साधक के व्यक्तित्व में आकर्षण, तेज और नेतृत्व क्षमता बढ़ाता है।
📿 जाप विधि और नियम
  • माला: जाप के लिए रुद्राक्ष या स्फटिक की माला का उपयोग करें।
  • समय और दिशा: माता मातंगी की पूजा रात्रि में अत्यधिक फलदायी मानी जाती है। अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।
  • अनुष्ठान: जाप से पूर्व माता मातंगी को लाल वस्त्र, पुष्प और मिष्ठान्न अर्पित करें।

इस प्रकार आज दिन तक मातंगी की मूर्ति मोढेरा में उस वाव में ही समाहित है वर्षो बाद भी इसे उस वाव में से नहीं निकाला गया कारण यह की जिस समय ब्राह्मणों द्वारा इस मूर्ति को वाव में समाहित किया गया था तब ब्राह्मणों ने इस भय से की मुस्लिमो द्वारा इस मूर्ति को चैन खीचकर वाव में से निकाला नहीं जा सके इस हेतु माता मातंगी के समक्ष यह मनत रखी थी की जब तक मोड़ समाज के लोग मोढेरा में मातंगी के समक्ष एक साथ सवा लाख किलो नमक का भंडारे में उपयोग नहीं करेंगे तब तक मूर्ति को बाहर नहीं लाया जा सकेगा यही कारण है की आज भी मूर्ति उक्त वाव में ही है। मोढेरा भक्त मंडल द्वारा उक्त वाव के चारो और लोहे की जाली से स्थान को सुरक्षित किया गया है , एवं मातंगी धाम मोढेरा में मातंगी की उसी मूर्ति की प्रतिकृति के रूप में मातंगी की मूर्ति स्थापित की गयी ।

मातंगी फोटो गेलेरी

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मातंगी मंदिर झाबुआ फोटो गेलेरी

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मातंगी धाम: विडियो संग्रह

मातंगी धाम वीडियो

📿 वीडियो संग्रह कुल 3 वीडियो • मातंगी धाम, झाबुआ
मातंगी धाम पर 15 वे पाटोत्सव का आयोजन - 2023
Duration: 01:53 | श्रेणी: महोत्सव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और अम्बानी परिवार की कुलदेवी का मंदिर झाबुआ में
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'मातंगी चालीसा' एल्बम को यूट्यूब पर पूरे विश्व में १ करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका
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आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों की दिव्य झलकियाँ