|| सिद्धपीठ बालाजी धाम ||
कृषि विज्ञान केंद्र (कृषि फार्म) परिसर, झाबुआ
मां मातंगी मंदिर प्रांगण के समीप ही यह अलौकिक सिद्धपीठ बालाजी धाम स्थित है। इतिहास के अनुसार, पूर्व में यहाँ घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर हनुमान जी का एक छोटा सा चबूतरा हुआ करता था। कृषि विभाग के धर्मपरायण कर्मचारियों ने यहाँ नित्य पूजन की शुरुआत की थी।
वर्ष 1993 में जनसहयोग के पावन संकल्प से यहाँ एक भव्य और सुंदर मंदिर आकार ले सका और प्रभु की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। शास्त्रों के अनुसार, जिस स्थान पर निरंतर 12 वर्षों तक बिना रुके नित्य पूजा-पाठ होता है, वह क्षेत्र सिद्ध हो जाता है। इसी कारण अनवरत रामायण व सुंदरकांड पाठ के प्रताप से इसे 'सिद्धपीठ' की संज्ञा मिली।
यह मंदिर झाबुआ के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) फार्म की पहाड़ी पर स्थित होने के कारण अत्यंत अनूठा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
प्राकृतिक वातावरण
चारों ओर कृषि फार्म की हरियाली, शांत और प्रदूषण मुक्त आध्यात्मिक वातावरण।
पहाड़ी सौंदर्य
ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ से प्रकृति का बेहद मनोरम दृश्य दिखाई देता है।
कृषि-भक्ति संगम
कृषि वैज्ञानिकों, कर्मचारियों और कृषकों की अटूट श्रद्धा का केंद्र।
पवित्र परिसर
मातंगी माता मंदिर और बालाजी धाम का एक ही प्रांगण में होना इसकी दिव्यता बढ़ाता है।
सिद्धपीठ बालाजी धाम पर प्रतिवर्ष श्री हनुमान जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भव्य पैमाने पर मनाया जाता है, जिसमें संपूर्ण झाबुआ अंचल से हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु उमड़ते हैं:
🚩 महाभिषेक व श्रृंगार: जन्मोत्सव के पावन अवसर पर तड़के प्रभु बालाजी का सिंदूर, अष्टगंध और दिव्य चोलों से अलौकिक श्रृंगार किया जाता है।
अखंड रामायण पाठ की पूर्णाहुति के साथ ही विशाल मारुति यज्ञ (हवन) का आयोजन होता है।
शाम को महाआरती के पश्चात समस्त भक्तों के लिए विशाल भंडारे (महाप्रसादी) का आयोजन कृषि फार्म प्रांगण में किया जाता है, जो देर रात तक चलता है।
पूर्व सेवादार: कृषि विभाग के निष्ठावान कर्मचारी श्री शिवनारायण पुरोहित ने पिछले 16 से अधिक वर्षों तक अकेले इस मंदिर की देखरेख और पूजन व्यवस्था का जिम्मा पूरी निष्ठा से संभाला।
वर्तमान सेवादार: श्री पुरोहित जी की सेवानिवृत्ति के पश्चात अब सर्वसम्मति से यह पावन उत्तरदायित्व श्री राकेश त्रिवेदी को सौंपा गया है, जो पूरी श्रद्धा और तत्परता से मंदिर की व्यवस्थाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।



