इस अनंत ब्रह्मांड को संचालित करने वाली आद्याशक्ति के दस परम दिव्य स्वरूप 'दस महाविद्या' के नाम से पूजनीय हैं। इसी पावन श्रृंखला के नौवें क्रम में आदिस्वरूपिणी भगवती मातंगी साक्षात प्रकट होती हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, देवाधिदेव भगवान शिव के 'मतंग' स्वरूप की शक्ति और सहचरी होने के कारण संपूर्ण लोकों में इन्हें 'माँ मातंगी' के नाम से सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ।
मानव जीवन में महामातंगी की दीक्षा या साधना का सुअवसर प्राप्त होना ही ईश्वरीय कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस साधना की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए परम तपस्वी महर्षि विश्वामित्र ने स्पष्ट किया है कि माँ मातंगी की आराधना करने पर बाकी नौ महाविद्याओं की शक्तियां साधक को स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। यदि कोई साधक अन्य नौ शक्तियों की उपासना न भी कर सके, और केवल एकाग्रचित्त होकर मातंगी साधना को सिद्ध कर ले, तो उसका जीवन हर दृष्टिकोण से परिपूर्ण हो जाता है।
अर्थात: मातंगी ही सर्वोपरि श्रेष्ठ साधना है और केवल माँ मातंगी की शरण में ही पूर्णत्व संभव है।
यूं तो माँ मातंगी जीवन के सूक्ष्म और स्थूल दोनों ही पक्षों को संवारती हैं, परंतु कलयुग में साधकों के बीच यह साधना विशेष रूप से तीव्र भौतिक उन्नति और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सर्वप्रिय रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिभुवन स्वामी भगवान विष्णु ने सर्वसुख, अकूत संपदा और चिरस्थायी उच्च पद की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम माँ मातंगी की ही आराधना की थी।
इस दिव्य शक्ति की महिमा इतनी व्यापक है कि बौद्ध परंपराओं में भी इन्हें "मातागिरी" नाम से बेहद आदरणीय माना गया है। गुप्त तंत्र विज्ञान के अनुसार, भगवती मातंगी साक्षात वाग्देवी सरस्वती का ही प्रखर रूप हैं, जो त्रिपुरसुन्दरी के ब्रह्मांडीय रथ की मुख्य सारथी और प्रधान सलाहकार की भूमिका निभाती हैं।
हम जीवनभर कड़ा परिश्रम करते हैं, परिवार और समाज को खुश रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं, फिर भी कई बार हमें वह आदर-सत्कार नहीं मिलता जिसके हम हकदार होते हैं। इसका मूल कारण जीवन में 'बहुमत' यानी प्रखर लोकप्रियता और आकर्षण का अभाव है। जब तक समाज आपकी योग्यता को स्वीकार करके आपके सामने नतमस्तक नहीं होता, तब तक अपनों के बीच भी केवल उपेक्षा ही मिलती है। लेकिन जैसे ही माँ मातंगी की कृपा से आपके व्यक्तित्व में तेज और प्रसिद्धि का संचार होता है, धन की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी स्वयं आपके द्वार पर आने को विवश हो जाती हैं।
- अभूतपूर्व कीर्ति और यश: इस साधना की पूर्णता के बाद साधक जिस भी कार्यक्षेत्र या समाज में कदम रखता है, वहां उसे अद्वितीय ख्याति प्राप्त होती है। उसका व्यक्तित्व अत्यंत चुंबकीय, लोकप्रिय और यशस्वी बन जाता है।
- अखंड गृहस्थ सुख और कुल-प्रतिष्ठा: चूंकि यह साधना सीधे तौर पर सौभाग्य से जुड़ी है, इसलिए साधक को सुखी दांपत्य जीवन, योग्य संतान, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। परिवार में उसका मान-सम्मान और प्रभुत्व कई गुना बढ़ जाता है।
- अकूत धन-संपदा एवं राजसी सुख: माँ मातंगी के भीतर साक्षात महालक्ष्मी का वास है। फलतः साधक की दरिद्रता का समूल नाश होता है। निरंतर आय के स्रोत, भव्य भवन, उत्तम वाहन सुख, समाज में उच्च पद-प्रतिष्ठा और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति पलभर में हो जाती है।
सनातन तंत्र ग्रंथों के अनुसार, महाविद्या मातंगी देवी दसमहाविद्या साम्राज्य के नौवें गौरवशाली सिंहासन पर अधिष्ठित हैं। वे पराशक्तियों के उस सर्वोच्च शिखर का प्रतिनिधित्व करती हैं जो साधक को अद्वितीय बुद्धिमत्ता, दिव्य कलात्मक कौशल और अचूक वाक्-सिद्धि (वाणी की शक्ति) प्रदान करने में पूरी तरह समर्थ हैं।
सर्वसिद्धिप्रदात्री च सर्वकामफलप्रदा॥”
- महापीठ कामाख्या (असम): ५१ सिद्ध शक्तिपीठों के पावन परिसर में माँ का यह रूप तंत्र साधना का केंद्र है।
- मातंगी शक्तिपीठ, उज्जैन (म.प्र.): राजा विक्रमादित्य की तपोभूमि पर बाबा कालभैरव मंदिर के समीप स्थित एक परम जाग्रत स्थान।
- तारापीठ (पश्चिम बंगाल): तंत्र और अघोर विधा के साधकों की महा-साधना स्थली, जहाँ देवी का यह स्वरूप अति उग्र और फलदायी है।
- हिंगलाज महाशक्तिपीठ (पाकिस्तान): दुर्गम गुफाओं के मध्य स्थित प्राचीन और चमत्कारी सिद्ध शक्तिपीठ, जहाँ माँ की गुप्त ऊर्जा व्याप्त है।
- यह एक उच्च स्तरीय महाविद्या साधना है, अतः इसे अनिवार्य रूप से केवल किसी सिद्ध और योग्य गुरु के दिव्य मार्गदर्शन में ही संपन्न करें।
- साधना में उपयोग होने वाले सभी यंत्र, माला और गुटिका पूरी तरह से प्राण-प्रतिष्ठित और सिद्ध चैतन्य युक्त होने चाहिए।
- साधना की तय समय सीमा (जैसे ११ या २१ दिन) के नियमों का अटूट निष्ठा के साथ नियमित पालन करें, बीच में खंडित न करें।
- साधना काल में आने वाले अनुभवों को पूरी तरह गुप्त रखें और पग-पग पर गुरुदेव की आज्ञा व मर्यादा का अक्षरशः पालन करें।
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्र
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥
गृहाणास्मितकृतम् जपं।
सिद्धिर्भवतु मे देवी
त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ||
मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।।
गोपनीयं महा-देवि, मौनी जापं समाचरेत् ।।
तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ।। 1 ।।
पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा।
त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ।। 2 ।।
ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।
महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ।। 3 ।।
अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।
ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ।। 4 ।।
रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।
नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ।। 5 ।।
महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।
लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ।। 6 ।।
चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः।
स-विसर्ग महा-देवि हृदयं पातु सर्वदा ।। 7 ।।
नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।
उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ।। 8 ।।
उग्र-तारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।
भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ।। 9 ।।
जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका।
विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ।। 10 ।।
नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ।। 11 ।।
रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।
ऊर्घ्वं पातु महा-देवि देवानां हित-कारिणी ।। 12 ।।
पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।
प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ।।
मातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।
सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ।। 13 ।।
त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ।। 1 ।।
यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।
परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ।। 2 ।।
गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि।
ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ।। 3 ।।
नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ये देवा सुर-सत्तमाः ।। 4 ।।
ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः।
तं दृष्ट्वा साधक देवि लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ।। 5 ।।
कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।
राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ।। 6 ।।
सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः।
इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ।। 7 ।।
अल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।
गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ।। 8 ।।
तस्मै मातंगिनी देवी, सर्व-सिद्धिं प्रयच्छति ।।


